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कालीकट की सड़कों पर चलते हुए (III)

Read “Religion and Urbanity Blog” in Hindi!
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This post is a Hindi translation by Ahmad Ali of the blog post published by Susanne Rau in October 2020: Walking through the streets of Calicut (III)

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काफी समय से मैंने कालीकट के बारे में कुछ नहीं लिखा है। मार्च के अंत में जो मैं वहां से वापस आयी हूँ उसके बाद से मेरा भारत आना नहीं हुआ। अभी तक, मेरा रिसर्च वीजा स्थगित है। लेकिन अब स्थिति मार्च के मुकाबले पूरी तरह से बदल चुकी है। उस समय भारत को “हाई रिस्क कंट्री” नहीं माना जाता था, अब यह कोरोना संक्रमण दर के मामले में दुनिया के सबसे प्रभावित देशों में से एक है, जैसा कि जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के COVID-19 डैशबोर्ड से पता चलता है। लगभग 80 लाख संक्रमित (कुल मिलाकर) और 1,00,000 से अधिक मौतें, लगभग 1.3 अरब की आबादी के संदर्भ में देखी जानी चाहिए। सांख्यिकीय रूप से, संक्रमण का प्रसार सीमित लगता है। दूसरी ओर, मैंने हाल ही में एक भारतीय डॉक्टर को टीवी पर (वेल्टस्पीगल चैनल पर, दिनांक 4.10.2020 को) कहते सुना कि वास्तविक मामलों की संख्या अनुमानित रूप से दस गुना अधिक है, उस समय लगभग 63 मिलियन लोगों में हल्के लक्षण या कोई लक्षण नहीं थे। किसी भी स्थिति में, संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। केरल (जिसकी आबादी लगभग 34 मिलियन है) वहां अक्टूबर की शुरुआत में एक ही दिन में लगभग 10,000 नए मामले दर्ज किए गए थे, जिसके बाद राज्य ने कुछ दिन पहले फिर से अपने प्रबंधों तथा व्यवस्थाओं को सख्त कर दिया है। 31 अक्टूबर तक पांच या इस से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। उस क्षेत्र के मेरे सहयोगी मुझे लिखते हैं कि उन्हें हफ्तों से आर्काइव, लाइब्रेरी और कुछ मामलों में यूनिवर्सिटी और कॉलेज तक पहुंच नहीं मिली है। कुट्टीचिरा जिला, जो कालीकट का पुराना शहर है और जहां मुस्लिम प्रभाव अधिक है, वहां एक सहयोगी फील्ड रिसर्च करना चाहते थे, लेकिन वहां रहने वाले लोगों के अलावा किसी और को हफ्तों से प्रवेश नहीं मिला है, कुछ रास्ते पूरी तरह से बंद हैं। ऐसे उपायों के फायदे और नुकसान पर चर्चा की जा सकती है, ये राजनीतिक फैसले हैं, जिन पर हम इतिहासकारों का अभी (या कहा जाए अभी तक) बहुत कम प्रभाव है, लेकिन हमें इनके साथ काम करना सीखना होगा। मार्टिन क्राइस्ट ने हाल ही में अगस्त और सितंबर में म्यूनिख आर्काइव में अपने अनुभवों के बारे में लिखा । वहाँ विशेष नियमों के साथ काम करना संभव था, जैसे मास्क पहनना, दूरी बनाए रखना, हाथ धोना, पहले से पंजीकरण करना या केवल आधे दिन के स्लॉट बुक करना। बेशक, यह थकाने वाली चीज़ें हैं, व्यक्ति को धीमा और सीमित महसूस होता है, लेकिन चतुराई से खुद को व्यवस्थित करें तो पूरा दिन काम करना संभव है – कम से कम बड़े शहरों में, जहां ऐतिहासिक शोध के कई स्थान हैं।

भारत में वर्तमान स्थिति को देखते हुए, न तो लचीला समय-स्थान प्रबंधन और न ही वास्तविक विकल्प मददगार साबित हो रहे हैं। देश के अंदर हों या बाहर, इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मेरे सहयोगियों को वहां  ऐतिहासिक स्थलों और उनके शोध स्थानों तक लगभग कोई पहुंच नहीं है। अब केवल उन्हीं दस्तावेज़ों पर काम किया जा सकता है जो पहले से छपे हुए हैं, डिजिटाइज़ किए गए हैं, या मार्च 2020 में लॉकडाउन शुरू होने तक रिकॉर्ड किए जा चुके थे। इसलिए, मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मैं यूरोपीय परंपरा का हिस्सा हूं, जहां कई लोगों ने कालीकट शहर की खोज की और अपने नोट्स छोड़े। इनमें से एक लुडोविको डी वार्थेमा थे, जो बोलोनिया से थे, और मैं यहां उनके दस्तावेज़ों पर काम करना चाहती हूं।

लुडोविको डी वार्थेमा के बारे में बहुत कम जानकारी है। उनका जन्म 1470 में बोलोग्ना में हुआ था और उनकी मृत्यु 1510 और 1518 के बीच किसी समय हुई। 1501 में, उन्होंने वेनिस से होली लैंड की यात्रा शुरू की, वहां से वे “अरबिया फेलिक्स” होते हुए दक्षिण एशिया पहुंचे। लेखक आगे भी गए, जैसे दक्षिणपूर्व एशिया (मोलुकस, सुमात्रा, जिनके बारे में वे बताते हैं), इस बात पर लंबे समय से संदेह रहा है (Reichert 1996, p. 11; Juncu 2015, p. 165f.)। हो सकता है कि वे उन सभी शहरों में न गए हों जिनका उन्होंने वर्णन किया है, लेकिन खासकर मालाबार तटीय शहरों के मामले में, उनके विवरण इतने विस्तृत हैं और केवल नृवंशविज्ञान साहित्य में दिए गए विवरणों पर आधारित नहीं हैं, इसलिए संभव है कि उन्होंने ज्यादातर चीजें खुद देखी हों या स्थानीय लोगों से पूछताछ की हो। उस समय वे बिल्कुल स्वतंत्र और बिना रुकावट के यात्रा नहीं कर सकते थे, बल्कि इसके लिए कुछ तैयारी और नई परिस्थितियों के अनुकूल होने की जरूरत थी। संवाद करने और समझने के लिए, उन्होंने अरबी और मलयालम सीखी, जो मालाबार तट पर बोली जाती है। मक्का और मदीना जाने के लिए, उन्होंने ममलुक का वेश धारण किया। अन्य मामलों में भी, उन्हें सावधानी से आगे बढ़ना पड़ा, शत्रुतापूर्ण समूहों के बीच फसने से खुद को बचाना पड़ा, युद्ध में लड़ना पड़ा जब कोई चारा नहीं था, और इस बीच उन्हें ऐसी स्थितियों में पहुंचना पड़ा जहां वे अपने लिए कुछ पैसे कमा सकें। “कंबाया” (खंभात) भारत में उनकी पहली नगरी थी। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद वे चौल, दाभोल और ‘गोगा’ (गोवा) गए। 1505 में, वे कालीकट पहुँचे, जहाँ उन्होंने कुछ समय बिताया और फिर सर्दियाँ कन्ननूर में और 1506 की वसंत और गर्मियाँ कोचीन में बिताईं। 1507 में, उन्होंने कन्ननूर की नौसैनिक लड़ाई में पुर्तगालियों के लिए युद्ध किया, जिसके लिए उन्हें तत्काल ही ‘नाइटहुड’ (शूरवीर की उपाधि) दी गई (Reichert 1996, पृष्ठ 12, 16)। उसी वर्ष, वे एक पुर्तगाली जहाज में सवार होकर पुर्तगाल लौटने में सक्षम हुए, जहाँ उन्होंने सीधे राजा मैनुएल प्रथम से उनके शीतकालीन आवास में मुलाकात की। राजा ने उनसे भारत में उनके अनुभवों के बारे में पूछा (Varthema 1996, पृष्ठ 278)। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, क्योंकि यह वही राजा था जो उस समय ‘एस्टाडो दा इंडिया’ नामक उपनिवेश साम्राज्य बनाने की प्रक्रिया में था। उनके दिए गए विवरणों के बदले में, पुर्तगाली राजा ने उनकी ‘नाइटहुड’ की पुष्टि की। इसके बाद, वे रोम की यात्रा पर निकल पड़े। उसी वर्ष, उन्हें अपनी यात्रा रिपोर्ट ‘इटिनेरारियो’ (Itinerario) को प्रकाशित करने की अनुमति मिली। यह रिपोर्ट न केवल रोमांचक विवरणों के कारण पढ़ने योग्य थी, बल्कि इसमें व्यापार मार्गों, संभावित व्यापारिक वस्तुओं (साथ ही इसमें सम्मिलित बॉटनी यानी वनस्पति विज्ञान संबंधी जानकारियाँ), कीमतों, भौगोलिक और नौवहन (नेविगेशन) संबंधी डेटा, और संचार विधियों की जानकारी भी थी।

1510 में इस यात्रा वृत्तांत का इतालवी संस्करण प्रकाशित हुआ, और 1515 में इसका जर्मन अनुवाद ऑग्सबर्ग में प्रकाशित हुआ, जिसमें जोर्ग ब्रेउ (Jörg Breu) द्वारा बनाई गई तस्वीरें भी थीं। यह जियोवानी बतिस्ता रामूसियो (Giovanni Battista Ramusio) द्वारा संकलित यात्रा साहित्य के संग्रहों में भी शामिल किया गया (1550); 1550 तक इसकी 31 विभिन्न भाषाओं में अनुवादित प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं। महान ब्रह्मांड वैज्ञानिक सेबेस्टियन मंस्टर (Sebastian Münster) ने 1532 में अपने विश्व मानचित्र पर उन्हें एक ‘विश्वयात्री’ के रूप में अमर कर दिया – या आज के शब्दों में कहें, तो एक ‘ग्लोबट्रॉटर’। इस मानचित्र के निचले दाएँ कोने में उन्हें ‘वार्टोमस’ (Vartomus) के रूप में चित्रित किया गया है।

“सेबास्टियन म्यून्स्टर का विश्व मानचित्र (टाइपस कॉस्मोग्राफिकस यूनिवर्सलिस) सन् 1532 का बना हुआ है। यह कॉपीराइट-मुक्त है क्योंकि लेखक की मृत्यु को 70 साल से अधिक हो चुके हैं। अधिक जानकारी और उच्च रिज़ॉल्यूशन वाला मानचित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें ।“

वार्थेमा (Varthema) को ‘फ्लानेउर’ (Flâneur) या बिना उद्देश्य के घूमने वाला व्यक्ति नहीं कहा जा सकता, बल्कि वे एक नृवंशविज्ञानी (Ethnographer) थे, जो समाज में भाग लेते हुए उसका अवलोकन भी करते थे। इसके अलावा, उन्हें ‘जिज्ञासा-प्रेरित’ व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया है (Rubiés 2004, पृष्ठ 125-163; Chaudhuri 2020, पृष्ठ 23, 31)। इसका मतलब यह है कि उनकी कथा में आप उन्हें सड़कों पर घूमते हुए नहीं देख सकते। लेकिन वे केवल भूगोल, वनस्पति और जीव-जंतुओं में ही रुचि नहीं रखते थे, बल्कि वे लोगों, उनके पहनावे (या नग्नता), उनके घरों, व्यवहार और रीति-रिवाजों के प्रति भी उतने ही उत्सुक थे। चूंकि यह दक्षिण एशिया पर लिखे गए शुरुआती और कई मायनों में नवीन यात्रा वृत्तांतों में से एक था, इसलिए उनके विवरण यूरोपीय दृष्टिकोण से भारतीय ‘मूर्तिपूजक’ देवताओं की छवियों के निर्माण में भी उपयोग किए गए (Chaudhuri 2020, पृष्ठ 29; Leitch 2010, पृष्ठ 101-145)। हालांकि, अगर आप उनके विवरणों के माध्यम से उन शहरों की यात्रा करें, जिनका उन्होंने अधिक विस्तार से वर्णन किया, तो आपको कम से कम शहर की स्थिति, उसका मोटा नक्शा और घरों के निर्माण के बारे में कुछ जानकारी अवश्य मिलेगी। मेरी रुचि यहाँ कालीकट (Calicut) शहर के प्रति उनकी दृष्टि और वहाँ के शहरी समाज के विश्लेषण में है।

अपनी दूसरी पुस्तक की शुरुआत में, वे कालीकट में अपने आगमन की रिपोर्ट देते हैं और इसे अपने पहले ही वाक्य में ‘भारत का सिर’ (Head of India) कहते हैं (Varthema 1996, पृष्ठ 149; Varthema 1970, पृष्ठ 135)। बेशक, उस समय भारत की सीमाएँ आज जैसी नहीं थीं और यह किसी एकीकृत राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में भी नहीं था। लेकिन दक्षिण भारत में एक विशाल साम्राज्य, विजयनगर (Vijayanagar), था, जिसे शायद उन्होंने ध्यान में रखा हो। कालीकट, हालांकि, पश्चिमी तट पर स्थित एक छोटे राज्य की राजधानी थी, जिसे ज़मोरिन (Zamorin) शासक नियंत्रित करते थे, जो उस समय अन्य छोटे राज्यों पर भी अपनी सत्ता का दावा करते थे।

कालीकट क्षेत्र में व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण केंद्र भी था। मीरा जंकू (Meera Juncu) भी इस पहलू को एक महत्वपूर्ण कारण मानती हैं, जिसके चलते वार्थेमा ने कालीकट को ‘भारत की राजधानी’ के रूप में प्रस्तुत किया। एक ओर, वार्थेमा की ‘भारत’ की परिभाषा काफी व्यापक थी, जिसमें सिंधु क्षेत्र (आज का गुजरात) से लेकर पेगु (वर्तमान म्यांमार) तक के क्षेत्र शामिल थे। दूसरी ओर, कालीकट वह स्थान था, जिसके निकट कुछ वर्षों पहले वास्को डी गामा (Vasco da Gama) उतरे थे और जहाँ अपार धन होने की संभावना या जानकारी थी।

कालीकट यूरोपीय पाठकों के लिए ‘रहस्यमयी विदेशी संस्कृति’ (Exotic Strangeness) को प्रस्तुत करने के लिए एक आदर्श स्थान था। इसलिए, वार्थेमा ने कालीकट को एक प्रकार के ‘सांस्कृतिक मानक’ (Cultural Norm) के रूप में दर्शाया (Juncu 2015, पृष्ठ 168), मानो वहाँ का जीवन-व्यवहार पूरे भारत के लिए एक आदर्श था। और केवल उन्हीं स्थानों के बारे में उन्होंने अलग से टिप्पणी की, जहाँ चीजें कालीकट से भिन्न थीं।

शुरुआत में शहर का वर्णन वैसा ही किया गया है जैसा उस समय यूरोपीय मानवतावादियों (ह्यूमनिस्ट) द्वारा किया जाता था—शहर का स्थान, भौगोलिक विशेषताएँ, शहर का संक्षिप्त विवरण, और शहर के बीच से बहती हुई एक नदी। केवल एक चीज़ इसमें नहीं दी गई है, और वह है शहर की ऐतिहासिक उत्पत्ति, शायद इसलिए क्योंकि इसके बारे में किसी को भी सही जानकारी नहीं थी।

कालीकट, भारत के एक विशाल नगर के बारे में अध्याय

“कालीकट मुख्य भूमि पर स्थित है, और समुद्र की लहरें घरों की दीवारों से टकराती हैं। यहाँ कोई बंदरगाह नहीं है, लेकिन इस जगह से लगभग एक मील दक्षिण की ओर एक नदी है, जिसका मुहाना संकरा है और उसमें पानी की गहराई केवल पाँच या छह हाथ (spans) ही होती है। यह नदी कालीकट के बीच से बहती है और इसकी कई शाखाएँ हैं। इस शहर के चारों ओर कोई दीवार नहीं है, बल्कि घर एक मील तक पास-पास बने हुए हैं। उसके बाद, लगभग छह मील तक फैले हुए बड़े घर दिखाई देते हैं, जो एक-दूसरे से अलग हैं। यहाँ के घर बहुत साधारण हैं। दीवारें उतनी ही ऊँची हैं जितना एक घुड़सवार व्यक्ति होता है, और ज़्यादातर घरों की छत पत्तों से ढकी होती है, जिनमें ऊपर का कोई कमरा नहीं होता। इसका कारण यह है कि अगर ज़मीन में चार या पाँच हाथ गहराई तक खुदाई की जाए तो पानी मिल जाता है, इसलिए यहाँ बड़े मकान नहीं बनाए जा सकते। हालांकि, एक व्यापारी के घर की कीमत लगभग पंद्रह से बीस डुकाट (यूरोपीय मुद्रा) होती है। आम लोगों के घर की कीमत केवल आधा डुकाट या ज्यादा से ज्यादा एक या दो डुकाट होती है।“

(Varthema 1970, p. 135-136)

यह तस्वीर जॉर्ग ब्रॉय द एल्डर नाम के एक जर्मन कलाकार ने बनाई थी। यह एक लकड़ी की नक्काशी है जिसे वुडकट कहते हैं। यह तस्वीर “इटिनेरारियो” नाम की एक किताब के जर्मन अनुवाद से ली गई है, जो सन 1515 में छपी थी। इस तस्वीर को “गेइसबर्ग 1930” नाम की एक दूसरी किताब (पहला भाग, तस्वीर नंबर 215) से लिया गया है।

जर्मन संस्करण के लिए ऑग्सबर्ग (Augsburg) के चित्रकार और लकड़ी पर उकेरने वाले कलाकार जोर्ग ब्रॉय (Jörg Breu) ने इस विवरण को चित्र के रूप में प्रस्तुत किया। इस चित्र में कालीकट शहर बिना दीवारों के दिखाया गया है, जिसमें छोटे और अलग-अलग बने घर हैं, जिनका सही मायने में कोई पक्का फर्श नहीं है क्योंकि ज़मीन के नीचे पानी का स्तर बहुत ऊँचा है। इस वर्णन से हमें घरों के मूल्य की जानकारी भी मिलती है—व्यापारियों के घर महंगे थे, जबकि आम लोगों के घर सस्ते। वर्थेमा ने यह माना कि समाज की संरचना भी लोगों के घरों और उनकी जीवनशैली में झलकती है। इसी कारण से, उन्होंने कालीकट के समाज में मौजूद विभिन्न सामाजिक वर्गों, या कहें कि जातियों, में रुचि दिखाई। उन्होंने खासतौर पर ध्यान दिया कि ब्राह्मणों की स्थिति सबसे ऊँची थी और उनकी यूरोप के पादरियों से तुलना की गई थी।

ब्राह्मणों के बारे में अध्याय—यानी कालीकट के पुजारी

यह जानना दिलचस्प और महत्वपूर्ण है कि ये ब्राह्मण कौन हैं। आपको यह पता होना चाहिए कि वे धर्म के सबसे प्रमुख व्यक्ति होते हैं, जैसे हमारे यहाँ पादरी होते हैं। जब राजा शादी करता है, तो वह सबसे योग्य और सम्मानित ब्राह्मण को चुनता है और उसे अपनी पत्नी के साथ पहली रात बिताने को कहता है, ताकि वह उसे “शुद्ध” कर सके। यह मत सोचिए कि ब्राह्मण खुशी-खुशी यह काम करने जाता है। राजा को उसे चार सौ से पाँच सौ डुकाट तक भुगतान करना पड़ता है। यह प्रथा केवल राजा के लिए थी, कालीकट में और कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता था। अब हम कालीकट में मौजूद विभिन्न वर्गों [या जातियों] का वर्णन करेंगे।

(Varthema 1970, p. 141)

यह पाठ शीर्षक से थोड़ा अधिक विस्तृत और स्पष्ट है, क्योंकि ब्राह्मण केवल पुजारी ही नहीं होते, बल्कि वे सभी लोग इसमें शामिल हैं जो ज्ञान, विशेष रूप से धार्मिक ज्ञान के संरक्षक होते हैं। इसी कारण उन्हें “धर्म का प्रमुख व्यक्ति” कहा गया है। केरल में इन्हें अक्सर “नंबूदरी” (Namboothiri) कहा जाता है। यह वही वर्ग था, जिसके पास बड़े भूमि सुधार (land reform) से पहले ज़्यादातर ज़मीन हुआ करती थी।

कालीकट के गैर-मुस्लिम (पैगन) समाज और उनके वर्गों के बारे में अध्याय

कालीकट में पहले वर्ग के लोगों को ब्राह्मण कहा जाता है। दूसरा वर्ग “नाएरी” (Naeri) कहलाता है, जो हमारे समाज में कुलीन (gentlefolk) समझे जाने वाले लोगों के समान हैं। इन्हें हमेशा तलवार और ढाल, या धनुष और भाले लेकर चलना पड़ता है। जब वे गलियों से गुजरते हैं, तो उनके पास हथियार होना अनिवार्य होता है; अगर वे बिना हथियारों के दिखे, तो वे सम्मानित वर्ग के नहीं माने जाएंगे।

तीसरा वर्ग “तीवा” (Tiva) कहलाता है, जो कारीगर (artisans) होते हैं। चौथा वर्ग “मेकुआ” (Mechua) कहलाता है, जो मछुआरे होते हैं।

पाँचवाँ वर्ग “पोलियार” (Poliar) कहलाता है, जो काली मिर्च, शराब और मेवे इकट्ठा करने का काम करते हैं। छठा वर्ग “हिरावा” (Hirava) कहलाता है, जो धान की खेती करते हैं और फसल काटते हैं।

ये दो अंतिम वर्ग—पोलियार और हिरावा—नाएरी और ब्राह्मणों के 50 कदम के दायरे में भी नहीं आ सकते, जब तक कि उन्हें बुलाया न जाए। वे हमेशा दलदली इलाकों (marshes) में छिपकर चलते हैं। जब वे इन इलाकों से गुजरते हैं, तो उन्हें ऊँची आवाज़ में चिल्लाना पड़ता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि नाएरी या ब्राह्मणों का उनसे सामना न हो। अगर वे चिल्लाए बिना किसी नाएरी के सामने आ जाएँ, और नाएरी उन्हें देख ले या उनके फलों को छू ले, तो नाएरी को बिना किसी सज़ा के उन्हें मारने का अधिकार होता है। इसी कारण, वे हमेशा ऊँची आवाज़ में चिल्लाते रहते हैं।

अब आपने कालीकट के इन छह वर्गों के बारे में जान लिया।

(Varthema 1970, p. 141-142) वर्थेमा के वर्णन के अनुसार, भारतीय समाज को छह जातियों में विभाजित किया गया था, जो ऊँच-नीच के क्रम में व्यवस्थित थीं: सबसे ऊपर पुजारी (ब्राह्मण), फिर योद्धा (क्षत्रिय), उसके बाद कारीगर (शिल्पकार), मछुआरे, कृषि मजदूर, और अंत में धान की खेती करने वाले लोग। कालीकट को “भारत का सिर” कहकर उन्होंने यह संकेत दिया कि यह सामाजिक व्यवस्था पूरे देश में लागू होती है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी, क्योंकि यह व्यवस्था समय के साथ विकसित हुई और प्राचीन वैदिक ग्रंथों से जुड़ी थी। इसके अलावा, क्षेत्रीय भिन्नताएँ भी थीं (इस पर अधिक जानकारी के लिए देखें: Jati 2020)। वर्थेमा ने जिस सामाजिक व्यवस्था का वर्णन किया है, वह एक क्षेत्रीय जाति व्यवस्था है, जिसमें कुछ विशेषताएँ और स्थानीय नाम हैं।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने किसी भी “अस्पृश्य” (untouchables) या समाज से बहिष्कृत लोगों का उल्लेख नहीं किया। बाद में, जाति व्यवस्था को चार मुख्य वर्गों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और “अस्पृश्य” के रूप में वर्णित किया गया, जिसमें पोलियार और हिरावा (Hitava) को रखा जाता। यूरोपीय मिशनरियों और विद्वानों ने इस तरह की “व्यवस्था” के निर्माण में योगदान दिया, लेकिन यह हमेशा एक स्थिर या एकल व्यवस्था नहीं थी, बल्कि समय के साथ बदलती रही। वर्थेमा भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बन गए, बिना इसे जाने, क्योंकि उनके विवरण को बाद के कुछ यात्रियों ने अपनाया (Varthema 1996, p. 155, n. 8)।

एक अन्य क्षेत्रीय विशेषता यह थी कि केरल की उच्च जातियों में कोई व्यापारी वर्ग नहीं था। यह एक व्यापारिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण और शायद समस्याग्रस्त भी था, जिसे हम आगे और विस्तार से देखेंगे। यह भी ध्यान देने योग्य है कि वर्थेमा ने अपने जैसे बाहरी लोगों, मुसलमानों (जो निश्चित रूप से उस समय शहर में रहते थे) या यहूदियों का उल्लेख नहीं किया। इसका सबसे अच्छा स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि जाति व्यवस्था हिंदू समाज से संबंधित थी, जिसे वर्थेमा ने “गैर-मुस्लिम” या “पैगन” (pagans) कहा। दूसरी ओर, उन्होंने जन्म और सामाजिक सीमाओं को बनाए रखने के तरीकों का विस्तार से वर्णन किया है। हालाँकि, उन्होंने इस पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं दी। लेकिन जिस तरह उन्होंने वर्णन किया कि निचली जातियों के ऊँची जातियों के करीब आने पर क्या हो सकता था, उससे यह संकेत भी मिलता है कि वे अपने पाठकों को यह बताना चाहते थे कि यूरोपीय समाज भी पूरी तरह समान नहीं था। एक यात्री के रूप में, शायद वे महसूस कर रहे थे कि अब उनके लिए यूरोपीय समाज में कोई निश्चित स्थान नहीं था।

एक अन्य स्तर पर, वर्थेमा द्वारा वर्णित “50 कदम की दूरी” का नियम हमें आज SARS-CoV-2 (कोरोना वायरस) महामारी के दौरान 1.5 मीटर की सामाजिक दूरी बनाए रखने की याद दिलाता है। सवाल उठ सकता है कि क्या आज वायरस शारीरिक और सामाजिक दूरी पैदा कर रहे हैं? लेकिन अगर गहराई से देखें, तो हमें एहसास होता है कि यह वायरस नहीं, बल्कि इंसान ही हैं जो इन सुरक्षा उपायों को परिभाषित करते हैं।

— सुज़ैन राओ

लेखिका – प्रोफेसर डॉ. सुज़ैन राओ एक इतिहासकार हैं जो स्थानिक और शहरी इतिहास में विशेषज्ञ हैं और 2009 से यूनिवर्सिटी ऑफ एरफर्ट में काम कर रही हैं। 2018 से, वह मैक्स वेबर रिसर्च सेंटर में “धर्म और शहरीकरण” शोध समूह की प्रवक्ता हैं। उनका हालिया कार्य “हिस्ट्री, स्पेस एंड प्लेस ” पढ़ने के लिए उपलब्ध है।

अनुवादक – अहमद अली जर्मनी के एरफर्ट विश्वविद्यालय में रिलीजियस स्टडीज के छात्र हैं, जहाँ वे प्रोफेसर डॉ. सुज़ैन राओ के अधीन “धर्म और शहरीकरण” शोध परियोजना में कार्यरत हैं। उनके शोध क्षेत्र में शामिल हैं – बौद्धिक इतिहास, वैश्विक रूप से ज्ञान का हस्तांतरण, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में समकालीन धर्म और संस्कृति, धार्मिक रीति-रिवाज, और भौतिक संस्कृति।

Bibliography

Varthema, Ludovico de, Reisen im Orient. Eingeleitet, übersetzt und erläutert von Folker Reichert, Sigmaringen 1996.

Quotations are taken from the English translation:

Varthema, Ludovico di, The Travels of Ludovico di Varthema in Egypt, Syria, Arabia Deserta and Arabia Felix, in Persia, India, and Ethiopa, A.D. 1503 to 1508, transl. John W. Jones, edited by George Percy Badger, New York 1970.

Research literature:

Chaudhuri, Supriya, “‘Not fit for any other pursuit’: Shifting places, shifting identities in Ludovico de Varthema’s Itinerario.”, in: Eastern Resonances in Early Modern England, edited by Claire Gallien and Ladan Niayesh, London 2020, p. 17-34. DOI: 10.1007/978-3-030-22925-2.

Flüchter, Antje, “Die Nairen der Malabarküste zwischen Adelsstand und Kriegerkaste. Praktiken des Vergleichens und die europäische Weltaneignung”, in: HerStory. Historical Scholarship between South Asia and Europe. Ed. Rafael Klöber and Manju Ludwig. Heidelberg: CrossAsia E-Publishing, 2018, p. 3-41.

Geisberg, Max (ed.), Die deutsche Buchillustration in der ersten Hälfte des XVI. Jahrhunderts, 2 vols., München 1930-1932, Reprint Doornspijk 1987.

Jati: A History of the Caste System in Ancient, Medieval, and Modern India. Posted on September 9, 2020. URL: https://brewminate.com/jati-a-history-of-the-caste-system-in-ancient-medieval-and-modern-india/ (21.10.2020)

Juncu, Meera, India in the Italian Renaissance. Visions of a contemporary pagan world 1300-1600, London 2015. https://doi.org/10.4324/9781315696737 [chapter 9]

Leitch, Stephanie, Mapping Ethnography in Early Modern Germany. History of Text Technologies, Palgrave Macmillan, New York 2010, chapter 5: “Recuperating the Eyewitness: Jörg Breu’s Images of Islamic and Hindu Culture in Ludovico de Varthema’s Travels (Augsburg: 1515)”, https://doi.org/10.1057/9780230112988_5

Reichert, Folker, „Ludovico de Varthema und sein Itinerar“, in: Ludovico de Varthema 1996, p. 7-31.

Rubiés, Joan-Pau, Travel and Ethnology in the Renaissance. South India through European Eyes, 1250–1625, Cambridge 2004.

Zeißig, Alexander, Indien in der Wahrnehmung Europas. Die Darstellung der Malabarküste in den Reiseberichten Balthasar Sprengers und Ludovico di Varthemas am Beginn des 16. Jahrhunderts, Masterarbeit Universität Erfurt, 2020.

Susanne Rau
Susanne Rau
Susanne Rau is professor of spatial history and culture at Erfurt University. Since 2018, she is directing the Centre for… Read more

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Susanne Rau (January 20, 2026). कालीकट की सड़कों पर चलते हुए (III). Religion and Urbanity: Reciprocal Formations. Retrieved October 17, 2026 from https://doi.org/10.58079/15j1v


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