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कालीकट की सड़कों पर चलते हुए (II)

Read “Religion and Urbanity Blog” in Hindi!
A series of blogposts is available in Hindi.

This post is a Hindi translation by Ahmad Ali of the blog post published by Susanne Rau in March 2020: Walking through the streets of Calicut (II)

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You can also listen to the Hindi text by clicking on “Podcast Audio”. The podcast was spoken and recorded by Ahmad Ali:

कोरोना के समय में, क्या अब भी उस बड़े शहर की सड़कों पर चलना संभव है, जो हमेशा लोगों से भरी रहती हैं? खासतौर पर उन शहरों में जहाँ फुटपाथ नहीं होते, और जहाँ राहगीर, विक्रेता और गाड़ियाँ (ऑटोरिक्शा से लेकर ट्रक तक) सड़कों पर एक ही जगह साझा करते हैं, वहाँ एक-दूसरे से टकराना बहुत आसान हो जाता है। और अभी, यही चीजें, जैसे कि शारीरिक नजदीकी और एक-दूसरे को छूना, वे हैं जिनसे हमें सबसे ज्यादा बचना चाहिए। कोविड-19 ने पहले ही हमारे शहरों को बदल दिया है। टियांजिन में, दुकानों और ग्राहकों को अलग करने या पूरे इलाकों को बंद करने के लिए नीली धातु की दीवारें बनाई गई हैं। इसे “नीली महान दीवार” कहा जा रहा है। ये दीवारें प्रतीकात्मक रूप से वायरस के खिलाफ सुरक्षा की तरह हैं, लेकिन असल में ये लोगों को एक-दूसरे से दूर रखने के लिए बनाई गई हैं। यह वायरस हमारे समाज को नए तरीकों से अलग-थलग करेगा। स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी की गई सीमाओं और नियमों, जिनमे सलाह-मशवरा से लेकर प्रतिबन्ध तक शामिल हैं, ये इन चीज़ों की बस शुरुआत है।

कालीकट का कोरोना से क्या संबंध है? असल में, ना के बराबर। फिलहाल भारत उन देशों में नहीं है जहाँ कोरोना का बड़ा खतरा है। अभी 87 ज्ञात और पुष्टि किए गए मामले हैं, जिनमें से 19 केरल राज्य में हैं। लेकिन क्योंकि जर्मनी उन जोखिम वाले देशों में शामिल है, भारतीय अधिकारियों ने मुझे 13 मार्च 2020 को “मेरी खुद की सुरक्षा” के लिए “क्वारंटीन” में रखा है। यह एक तरह की “होटल क्वारंटीन” है, मतलब मुझे होटल से बाहर जाने से एहतियात बरतने के लिए कहा गया है, शहर में “जरूरी न होने वाले” कामों से बचना है, और खासतौर पर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल नहीं करना है। यकीनन मेरे साथ इससे भी बुरा हो सकता था, खासकर जब जर्मनी से दोस्तों और सहकर्मियों की खबरें मुझे बिल्कुल भी यह अहसास नहीं दिलातीं कि मुझे वहाँ होना चाहिए। यह समझने के लिए कि क्यों केवल चीन, दक्षिण कोरिया और इटली ही जोखिम वाले इलाके नहीं हैं, आपको जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग (CSSE) के “कोरोनावायरस COVID-19 ग्लोबल केस” मानचित्र पर एक नजर डालनी होगी।

यह पूरा संदर्भ कालीकट में किए जा रहे शोध कार्य से जुड़ा है। सौभाग्य से, हफ्ते की शुरुआत में मुझे थोड़ा फील्डवर्क करने का मौका मिला। क्षेत्रीय अभिलेखागार (रेजनल आर्काइव्स) की यात्रा के साथ, मैंने डॉ. मुहम्मदअली (फारूक कॉलेज के इतिहास विभाग के प्रमुख) और डॉ. शिनॉय जेसिंथ (मालाबार क्रिश्चियन कॉलेज के एक युवा इतिहासकार, जिन्होंने कालीकट के औपनिवेशिक काल के शहरी विकास पर शोध किया है) के साथ एक छोटा “सिटी वॉक” भी किया। हमने ताली शिव मंदिर, एक जैन मंदिर (हालांकि हम इनमें से किसी के अंदर नहीं जा सके), 1888 में स्थापित रेलवे इंस्टीट्यूट, बड़े बाज़ार (वलियंगडी) का दौरा किया और अंत में मोथकारा मस्जिद पहुंचे, जिसे 19वीं सदी का माना जाता है।

ये स्थल यात्राएँ इस शोध कार्य का एक हिस्सा हैं—यह जानने के लिए कि आज कौन सी ऐतिहासिक इमारतें, सड़कें या चौराहे मौजूद हैं और वे कैसी दिखती हैं। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि क्या वो चीजें, जिन्हें पुराने यात्रियों ने देखा था, आज भी यहाँ हैं। मैं ऐतिहासिक यात्रा लेखों पर चिंतन करके वर्तमान समय की समस्याओं से कुछ हद तक खुद को बचा सकती हूँ। यह हमें याद दिलाते हैं कि उन पुराने यात्रियों को भी महामारियों और बीमारियों का सामना करना पड़ा था। यह एक मौका है यह याद रखने का कि हमारी यात्राएँ—चाहे निजी हों या व्यावसायिक, इच्छा से की गयी हों या प्रवासन द्वारा मजबूर होने पर—दुनिया में बीमारियों और महामारियों के फैलाव में हमेशा योगदान करती रही हैं।

शहरीकरण के विकास और उत्पत्ति पर आगे की समीक्षा करने के लिए, आज हम इतालवी यात्री पिएत्रो डेला वल्ले पर ध्यान देंगे, जिनकी रिपोर्टें नृवंशविज्ञान, वस्तु-आधारित दस्तावेज़ीकरण, खगोलीय स्थिति-निर्धारण और मार्गों के सटीक विवरणों का मिश्रण हैं।

फिर हम कहेंगे, हमारा उद्देश्य यह जानना है कि इस शहर का स्वरूप उसके सबसे आर्थिक विकास और प्रसिद्धि के समय कैसा था: घर, सड़कें, चौक और इमारतें कैसी थीं। लोग इस शहर में कैसे चलते-फिरते थे, वे इन स्थानों का कैसे उपयोग करते थे, और उनके बारे में क्या सोचते थे और उनसे क्या अपेक्षाएँ रखते थे। हमारे शोध समूह “धर्म और नगरीयता” में, हम मुख्य रूप से यह जांचते हैं कि कैसे धर्म और नगरीयता एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं: “धर्म ने शहरीकरण में क्या भूमिका निभाई? नगरीयता ने धर्म को कैसे बदला, और वे लगातार एक-दूसरे को कैसे प्रभावित करते रहे?” हालांकि, क्योंकि नगरीयता केवल धार्मिक प्रथाओं, व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा प्रभावित नहीं हुई है, हमें पहले कुछ सामान्य प्रश्न पूछने होंगे (किन परिस्थितियों में नगरीयता का उदय और संभवतः पतन होता है), जिससे हम विशेष रूप से धार्मिक पहलू को और अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सकें।

इतालवी यात्री लेखक, कवि और संगीतकार पिएत्रो डेला वल्ले (1586-1652), जो रोमन अभिजात वर्ग के सदस्य थे, उन्हों ने 1614 में पवित्र भूमि (जेरूसलम) की तीर्थयात्रा पर जाने का इरादा किया था। यह यात्रा भारत तक बढ़ गई, जो कुल 11 साल तक चली। 8 जून 1614 को, उन्होंने वेनिस से अपनी यात्रा शुरू की, सबसे पहले इस्तांबुल पहुंचे ताकि वे तुर्की और अरबी सीख सकें। करीब एक साल बाद, उन्होंने अपनी यात्रा को अलेक्जेंड्रिया और काहिरा होते हुए जेरूसलम की ओर बढ़ाया, जहाँ उन्होंने पवित्र स्थलों का दौरा किया। हालांकि, वे रोम वापस नहीं लौटे, बल्कि अपनी यात्रा को दमिश्क, बगदाद (जहां उन्होंने एक सीरियाई ईसाई महिला से विवाह किया, जिनकी यात्रा के दौरान मृत्यु हो गई) और इस्फहान (1617) की ओर जारी रखा। प्राचीन (यूरोपीय) भाषाओं में प्रशिक्षित, इस महानुभाव ने बेबीलोन, नीनवे और ऊर जैसे प्राचीन स्थलों का दौरा किया, जहाँ उन्होंने शिलालेखों (क्यूनिफॉर्म) की प्रतिलिपियाँ बनाईं। इसके बाद वे भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में पहुंचे। उन्होंने 1623 में सूरत पहुंचकर पश्चिमी तट के साथ दक्षिण की ओर यात्रा की और कालीकट तक पहुँचे। मस्कट, बसरा और अलेप्पो होते हुए वे रोम लौटे, जहां वे आखिरकार 28 मार्च 1626 को पहुंचे।

रोम में सम्मानजनक स्वागत के बाद, उन्हें अपनी यात्रा का वर्णन विस्तार से लिखने का समय दिया गया, जिसे 1650 से तीन खंडों में प्रकाशित किया गया। यह काम उनके एक मित्र को लिखे गए 54 पत्रों का संग्रह है। सातवें पत्र में, वे अपने कालीकट के “दौरे” का वर्णन करते हैं, जिसमें उन्होंने पहले मंगलुरु, कादीरी, कार्नाटि और कन्ननोर [कन्नूर] में रुकने के बाद कालीकट की यात्रा की थी।

महान ज़मोरिन द्वारा स्वागत किए जाने के बाद, उन्हें शहर और उसके निवासियों का पता लगाने का अवसर मिला। तो आइए, उनके साथ चलते हैं बाज़ार की गलियों में, वलियंगडी की सड़कों पर और एक और “उच्च वर्ग” के इलाके की ओर, जहाँ ज़मोरिन का महल स्थित है: “दोपहर के भोजन के बाद, मैं अपने जहाज के कप्तान और कुछ अन्य सैनिकों के साथ किनारे उतरा; हम बाज़ार देखने गए जो समुद्र के किनारे स्थित था; [1] मकान, या यूं कहें झोपड़ियाँ, मिट्टी से बनी थीं और उनकी छतें ताड़ के पत्तों से ढकी हुई थीं, जो बहुत ही नीची थीं; सड़कों भी बहुत संकरी थीं, लेकिन काफी लंबी; बाज़ार में हर तरह के खाने-पीने का सामान और अन्य आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध थीं, जो उनके रीति-रिवाजों के अनुसार जीवन के लिए जरूरी थीं; क्योंकि कपड़ों के लिए उन्हें बहुत कम आवश्यकता होती है, पुरुष और महिलाएं लगभग नग्न ही रहते हैं, केवल एक कपड़ा, चाहे वह सूती हो या रेशमी, कमर से घुटनों तक लटकता है और उनकी लज्जा को ढकता है; उच्च वर्ग के लोग इसे नीले रंग में, या सफेद रंग में नीली धारियों के साथ, या नीला और किसी अन्य रंग में पहनते हैं; एक गहरा नीला रंग [तुरचीनो] उनके बीच सबसे अधिक मूल्यवान माना जाता है।” (यात्रा, पृ. 360)। इसके बाद वे बालों और गहनों पर चर्चा करते हैं। पुरुष तलवार और ढाल लेकर चलते हैं।

आगे बढ़ने से पहले, पिएत्रो डेला वैले स्थानीय आबादी को सामाजिक और धार्मिक समूहों में विभाजित करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। मुख्य रूप से, यहां दो प्रमुख समूह हैं – “जेंटाइल्स” और “मलाबारी,” जो मूर्तिपूजकों के साथ रहते हैं, लेकिन असल में मुसलमान हैं: “कालीकट और इसके भीतरी हिस्सों के निवासियों में से अधिकांश, विशेषकर उच्च वर्ग, सभी जेंटाइल्स होते हैं, जो अधिकांशतः नायर जाति के होते हैं, पेशे से सैनिक, और काफ़ी बहादुर होते हैं। लेकिन समुद्र तट मलाबारी लोगों से भरा हुआ है, जो पुराने समय से यहाँ बसने आए लोग हैं। मार्को पोलो, जिन्होंने लगभग चार सौ साल पहले यात्रा लिखी थी, वे भी इनका उल्लेख करते हैं। ये लोग मूर्तिपूजकों के साथ घुल-मिलकर रहते हैं और वही भाषा बोलते हैं, लेकिन धार्मिक रूप से ये मुसलमान हैं। [2] इन्हीं के कारण इस पूरी तटीय पट्टी को मलाबार कहा जाता है, [3] जो भारत में समुद्री डकैतियों के लिए कुख्यात है, जिन्हें मलाबारी चोर अंजाम देते हैं। इसलिए कालीकट के बाज़ार में, उपरोक्त वस्तुओं के अलावा, हमने पुर्तगाली सामान भी बिकते देखा, जैसे कि तलवारें, हथियार, किताबें, गोवा के कपड़े और अन्य वस्त्र, जो पुर्तगाली जहाजों से समुद्र में लूटे गए थे। चूंकि ये चोरी की चीजें थीं और इस मामले में हम पर बहिष्कार का खतरा था, हमारे ईसाइयों ने इन्हें नहीं खरीदा। बाज़ार देखने के बाद और देर तक वहाँ रुकने के बाद, हमने सोचा कि शहर के आंतरिक और उच्च वर्ग के क्षेत्रों और राजा के महल के बाहरी हिस्से को देखें; क्योंकि उस समय राजा से मिलने का हमारा इरादा नहीं था और न ही हम इसके लिए तैयार थे, बल्कि हम वही कपड़े पहने हुए थे जो हमने जहाज पर पहने थे।” (यात्रा, पृष्ठ 361-362)। इसके बाद वे शहर में और आगे बढ़े, महल की ओर, उन ज़मीनों के बीच जहाँ बड़े-बड़े पेड़ लगे हुए थे और जिन पर जंगली बंदर चढ़ते-उतरते थे। यह विवरण खासकर इसलिए दिलचस्प है क्योंकि शहर का यह हिस्सा बाज़ार से पूरी तरह अलग था: “हम महल की ओर काफ़ी दूर तक चले, क्योंकि यह शहर बड़ा है, और हमने पाया कि यह बड़े-बड़े पेड़ों से भरी ज़मीनों से बना है। इन पेड़ों की शाखाओं में कई जंगली बंदर थे, और इन घने जंगलों के भीतर घर बने हुए थे, जो मुख्य रास्तों या सड़कों से काफ़ी दूर थे; ये घर छोटे दिखते थे, उनका बाहरी हिस्सा बहुत कम दिखाई देता था। इनके चारों ओर काले पत्थर की नीची दीवारें बनी थीं जो इन्हें सड़कों से अलग करती थीं, जो बाज़ार की सड़कों से कहीं बेहतर थीं, लेकिन बिना किसी खिड़की-वग़ैरा की सजावट के। इसलिए जो कोई भी इस शहर से गुज़रता है, उसे यह लगेगा कि वह किसी बाग में चल रहा है, न कि किसी आबाद शहर में। फिर भी, यह जगह घनी आबादी वाली थी, और यहाँ के निवासी तंग से मकानों में संतुष्ट रहते थे, जिसके कारण यह जगह छोटी लगती थी।” (पृष्ठ 362-363)। यहाँ से वे आगे बढ़े और वायसराय के एक आदमी से मिले, जो उन्हें गोवा से जानता था। अंततः, उसने उन्हें ज़मोरिन से मिलने के लिए मना लिया, जो इस समूह का स्वागत करने के इच्छुक थे। महल का मुख्य द्वार एक छोटे से “पियाज़ा” (चौराहे) पर स्थित था, जहाँ पेड़ थे, जो अंततः इन यात्रियों को छाया प्रदान कर रहे थे, जब वे धीरे-धीरे महल के अंदरूनी हिस्से में प्रवेश करने लगे। (पृष्ठ 363)।

— Susanne Rau

सुज़ैन राउ एरफर्ट विश्वविद्यालय में स्थानिक इतिहास और संस्कृति की प्रोफेसर हैं और केएफजी “धर्म और नगरीयता: परस्पर निर्माण” की प्रवक्ता हैं।

संदर्भ:

[1] सबसे अधिक संभावना है की यह बाज़ार रोड है।

[2] वास्तव में यहाँ के कई निवासी हिंदू थे।

[3] ग्रे के अनुसार, यह एक गलतफहमी है। यह शब्द द्रविड़ भाषा के “मला” (पहाड़) और अरबी “बार” या संस्कृत “बारा” से लिया गया है, जो किसी क्षेत्र को दर्शाता है। (यात्रा, खंड 1, पृष्ठ 121, टिप्पणी 4)। साथ ही देखें: “मलाबार कोस्ट”, URL: https://www.wikiwand.com/en/Malabar_Coast (14.3.2020)

Bibliography

Viaggi di Pietro della Valle il pellegrino ; con minuto ragguaglio di tutte le cose notabili osseruate in essi: descritti da lui medesimo in 54 lettere familiari all’erudito suo amico Mario Schipano, divisi in tre parti cioè: la Turchia, la Persia e l’India, Rom 1650-1658 (full text available on Gale)

Quotations are taken from the English translation:

The travels of Pietro della Valle in India, 2 vols., from the English translation of 1664, by G. Havers, ed. Edward Grey, London 1892.

Research literature:

Ayyar, K.V. Krishna, The Zamorins of Calicut. From the earliest times down to A.D. 1806, Calicut 1999 (first published 1938).

Flüchter, Antje, Frühneuzeitliche Indienwahrnehmung zwischen Empirie, Antike und Antiquarianismus. Die Briefe des Pietro della Valle (1586-1652), Maritime Entdeckung und Expansion. Kontinuitäten, Parallelen und Brüche von der Antike bis in die Neuzeit, ed. Raimund Schulz (Historische Zeitschrift / Beihefte (Neue Folge), vol. 77), Berlin/Boston 2019, p. 361-390.

Micocci, Claudia, Pietro Della Valle, Dizionario Biografico degli Italiani, vol. 37 (1989), p. 764-770.

“Pietro della Valle”, in: Encyclopædia Britannica [2019], URL: https://www.britannica.com/biography/Pietro-della-Valle (13.03.2020)

Susanne Rau
Susanne Rau
Susanne Rau is professor of spatial history and culture at Erfurt University. Since 2018, she is directing the Centre for… Read more

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Susanne Rau (November 12, 2025). कालीकट की सड़कों पर चलते हुए (II). Religion and Urbanity: Reciprocal Formations. Retrieved October 16, 2026 from https://doi.org/10.58079/154qo


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