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समुद्री जीवन के मौसम

Read “Religion and Urbanity Blog” in Hindi!
A series of blogposts is available in Hindi.

This post is a Hindi translation by Ahmad Ali of the blog post published by Sara Keller on 19 March 2025: “The Seasons of Maritime Life“.

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You can also listen to the Hindi text by clicking on “Podcast Audio”. The podcast was spoken and recorded by Ahmad Ali:

बंदरगाह वाले शहरों में शहरी जीवन का एक अलग ही रूप देखने को मिलता है, और इन्हें अक्सर जीवंत और गतिशील शहरों के रूप में देखा जाता है। दुनिया भर के समुद्री महानगर, जैसे शंघाई, न्यूयॉर्क, बॉम्बे, हैम्बर्ग या मार्सेई, अपने व्यस्त, विविधतापूर्ण और अच्छी तरह जुड़े होने के लिए जाने जाते हैं। यह बात पुराने जमाने के बंदरगाह शहरों पर भी लागू होती है। पुरातत्व और इतिहास हमें बताते हैं कि प्राचीन बंदरगाह शहर भी व्यस्त, विविधतापूर्ण और अच्छी तरह जुड़े हुए थे।

उदाहरण के लिए, 2200 ईसा पूर्व के आसपास बसा हड़प्पा शहर लोथल (आज का गुजरात, भारत), चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से अस्तित्व में रहा मिस्र का शहर अलेक्जेंड्रिया, या 10वीं से 15वीं शताब्दी तक फला-फूला इटली का तैरता शहर वेनिस—ये सभी उद्योग और व्यापार के सक्रिय केंद्र थे। इन शहरों में स्थानीय लोगों के साथ-साथ विदेशी व्यापारी और यात्री भी आते थे, जो समुद्र पार करके अपना माल बेचने और नई चीजें खरीदने आते थे।

लोथल, अलेक्जेंड्रिया, वेनिस और ऐसे ही कई प्राचीन बंदरगाह शहरों की अनोखी पहचान को समझने के लिए विविधता और गतिशीलता दो बड़े विषय रहे हैं। बंदरगाह शहरों में सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि व्यापारी, नाविक, राजदूत, तीर्थयात्री, वैज्ञानिक और तरह-तरह के यात्री भी आते-जाते थे। इसलिए इन शहरों में समुदायों, रीति-रिवाजों, भाषाओं और विचारों की भरमार रहती थी। ऐसे शहरों में लोगों का साथ रहना, एक-दूसरे के साथ मेलजोल, संघर्ष, बातचीत और समझौते जैसे विषय इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं।

एक और महत्वपूर्ण पहलू जिस पर ध्यान दिया गया है, वह है इन शहरों का वह वातावरण जहाँ तेज़ी से लेन-देन होता है, रचनात्मकता और लचीलापन देखने को मिलता है, और उद्यमशीलता (entrepreneurship) को बढ़ावा मिलता है। यह सब इसलिए होता है क्योंकि बंदरगाह शहर अक्सर “संक्रमण के क्षेत्र” होते हैं — यानी वे स्थान जो सीमाओं के आर-पार होते हैं, जहाँ कई संस्कृतियाँ, समुदाय और विचार मिलते और बदलते हैं। सीमा अध्ययन (boundary studies) में ऐसे स्थानों को liminal spaces, ecotones, या interphases कहा जाता है — ऐसे क्षेत्र जो स्थायी न होकर परिवर्तनशील और खुले होते हैं।

जब अन्य शहर स्थिरता और राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक नियमों को बनाए रखने की ओर झुकाव रखते हैं, तब बंदरगाह शहर नई चीज़ों के आदान-प्रदान और अज्ञात की खोज के मंच बन जाते हैं। ये शहर नई सोच को जन्म देते हैं और नवाचार (innovation) के लिए अनुकूल होते हैं। यहाँ चीज़ें बहुत तेज़ी से बदलती हैं — सामान के दाम एक रात में ऊपर-नीचे हो सकते हैं, फैशन और विचार बहुत तेजी से फैलते हैं। इस तेज़ी से बदलाव की वजह से लगता है कि जैसे समय की गति इन शहरों में आसपास के गाँवों या अन्य शहरों की तुलना में कहीं ज़्यादा तेज़ है।

चित्र 1. वेनिस: डोज पैलेस और मुख्य शहर चौक (सान मार्को) का दृश्य, 1732।
Canaletto द्वारा चित्रित पेंटिंग, शीर्षक: “The Bucintoro Returning to the Molo on Ascension Day”
(The Yorck Project (2002) 10,000 महान चित्रकलाओं का संग्रह (DVD-ROM), DIRECTMEDIA Publishing GmbH द्वारा वितरित। ISBN: 3936122202। सार्वजनिक डोमेन, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=148700)

बंदरगाह शहरों की शहरी जिंदगी को समझने का एक और तरीका है—उनकी समय की लय और गति। ऐतिहासिक समुद्री शहर न सिर्फ विविध और गतिशील थे, बल्कि उनका अपना एक अलग समय चक्र भी था। इन शहरों में लेन-देन की भरमार से एक तेजी का अहसास होता था, लेकिन इन्हें मौसम के हिसाब से भी समझना चाहिए। दरअसल, पुराने बंदरगाह शहरों की जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती थी। जब जहाजों का जमाना था, तब हवाएं ही तय करती थीं कि कब कारोबार होगा। हवाएं ही जहाजों को किनारे तक लाती थीं। इसलिए बंदरगाह शहर की जिंदगी मौसम के साथ पूरी तरह बदल जाती थी – जब हवाएं नहीं होती थीं (low season), तो शहर शांत और खाली रहता था, लेकिन जब हवाएं जहाजों को लेकर आती थीं, तो शहर एक जिंदादिल और भीड़भाड़ वाले केंद्र में बदल जाता था।

इस मौसमी असर की साफ मिसाल है हिंद महासागर के बंदरगाह शहर, जहाँ जहाजों की आवाजाही पूरी तरह मानसून की हवाओं के हिसाब से चलती थी। हड़प्पा सभ्यता के शुरुआती दिनों से ही इन हवाओं और समुद्री रास्तों की जानकारी ने व्यापार और अलग-अलग इलाकों के बीच लेन-देन को आसान बनाया, जिससे भारत लंबे समय तक समुद्री व्यापार का बड़ा केंद्र बना रहा। भारत का समुद्री तट हर जमाने के बंदरगाह शहरों से भरपूर रहा है, जो एक जिंदा समुद्री संस्कृति की कहानी बताता है। पहले हड़प्पा काल के शहर जैसे लोथल आए, फिर बाद के बंदरगाह शहर जैसे बारबरिकॉन (आज के कराची के पास), अरिकमेडु (पॉन्डिचेरी के पास), मुज़िरिस (केरल में) और बरीगाज़ा (गुजरात का भरुच)। इनके बाद मध्यकाल में कालीकट, सूरत, गोवा, मछलीपट्टनम, कोच्चि, चटगाँव जैसे और भी कई बंदरगाह शहर फले-फूले।

बहुत कम बंदरगाह शहर लंबे समय तक उपयोग में रह पाए, जिसकी मुख्य वजह थी समुद्र में गाद जमना और जलवायु परिस्थितियों में बदलाव। ये बदलाव इतने गंभीर होते थे कि बड़े व्यापारिक जहाज अब इन बंदरगाहों तक पहुँच ही नहीं पाते थे। हालाँकि, अगर हम इन बंदरगाहों की लंबी उम्र को देखें तो पता चलता है कि असल में यह समुद्री संस्कृति ही थी जो एक जगह के पतन के बाद दूसरी जगह जाकर जिंदा रही। पश्चिमी भारत का उदाहरण लें तो यहाँ के व्यापारी और उनका कारोबार गाद से भरते बंदरगाहों से बचने के लिए कई बार एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित हुआ। गुजरात की यह समुद्री संस्कृति एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया थी जो 12वीं-13वीं सदी में भरुच से खंभात (कैम्बे) आई, फिर 16वीं सदी के अंत तक खंभात से सूरत पहुँची, और आखिरकार 17वीं सदी के अंत से सूरत से बॉम्बे (मुंबई) चली गई। इस तरह भले ही बंदरगाह बदलते रहे, लेकिन समुद्री संस्कृति और व्यापार की परंपरा कभी खत्म नहीं हुई।

चित्र 2. सुरत का उत्कीर्णन (engraving) — कलाकार: याकोब वान डेर श्ले, 1753–55।
Koninklijke Bibliotheek (डच राष्ट्रीय पुस्तकालय) से।

दक्षिण एशिया में समय और स्थान के साथ फैले बंदरगाह शहरों की यह विशाल विविधता ने कई शहरी संस्कृतियों के विकास को संभव बनाया, लेकिन इन सभी शहरों में हवाओं द्वारा तय की गई एक समान लय थी। यात्रा किसी भी समय नहीं की जा सकती थी, और जहाजों को यात्रा शुरू करने के लिए सही मौसम का इंतजार करना पड़ता था। 17वीं सदी में मुगल साम्राज्य के प्रमुख बंदरगाह और दक्षिण एशिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री शहरों में से एक सूरत का उदाहरण लेते हैं। फ्रांसीसी रत्न व्यापारी जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर (1605-1689) ने अपने कई यात्रा वृतांतों में से एक में सूरत और फारस की खाड़ी के प्रवेश द्वार हॉर्मुज के बीच की समुद्री यात्रा का वर्णन इन शब्दों में किया है:

“साल में सिर्फ नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी और मार्च के महीने ही ऐसे होते हैं जब आप हॉर्मुज से सूरत और सूरत से हॉर्मुज के बीच जहाज से यात्रा कर सकते हैं। लेकिन ध्यान रहे, सूरत से जहाज फरवरी के अंत होने से पहले ही निकलने होते हैं। शुरुआत के चार महीनों में उत्तर-पूर्व की हवा चलती है जो सूरत से हॉर्मुज की यात्रा को सिर्फ 15-20 दिन में पूरा कर देती है। फिर यह हवा धीरे-धीरे उत्तर की तरफ मुड़ जाती है और अब यह हवा सूरत जाने और वहां से आने वाले दोनों तरह के जहाजों के काम आती है। इस दौरान व्यापारियों को समुद्र में 30-35 दिन बिताने पड़ते हैं। अगर आप हॉर्मुज से सूरत सिर्फ 14-15 दिन में पहुंचना चाहते हैं तो आपको मार्च या अप्रैल की शुरुआत में ही जहाज छोड़ना होगा, क्योंकि इस समय हवा आपके पीछे से चलती है जो जहाज को तेजी से आगे बढ़ाती है।” (टैवर्नियर, 1681: 2, अनुवाद लेखिका द्वारा)

टैवर्नियर का यह बयान भारतीय महासागर के पश्चिमी हिस्से में जहाज़ी यात्राओं के बारे में उस ज़माने के दूसरे विवरणों की पुष्टि करता है, जो बताते हैं कि ये यात्राएँ नवंबर से अप्रैल की शुरुआत तक ही हो पाती थीं। टैवर्नियर के मुताबिक, नवंबर से फरवरी के बीच हॉर्मुज से सूरत की यात्रा 15 से 20 दिन में पूरी हो जाती थी। मार्च में हॉर्मुज से सूरत या सूरत से हॉर्मुज की यात्रा में 30 से 35 दिन लगते थे। जबकि मार्च और अप्रैल की शुरुआत में हॉर्मुज से सूरत सिर्फ 14-15 दिन में पहुँचा जा सकता था। अन्य विवरणों से पता चलता है कि अलग-अलग समुद्री मार्गों के लिए यात्रा के समय भी अलग-अलग होते थे। आज के आधुनिक युग में जहाँ हम ट्रेन और हवाई जहाज़ की सुविधाओं, और खासकर इंजन तकनीक की वजह से साल के किसी भी दिन यात्रा शुरू कर सकते हैं, उस ज़माने के यात्रियों को सही मौसम का इंतज़ार करना पड़ता था।

एक व्यापार और क्षेत्रीय आदान-प्रदान पर निर्भर बंदरगाह शहर के लिए, यात्राओं का मौसमी चक्र शहरी जीवन पर गहरा असर डालता था। कुछ महीने ऐसे होते थे जब माल से लदे जहाज बंदरगाह पर पहुँचते, सामान की जाँच होती, उसे एक जहाज से दूसरे जहाज पर उतारा जाता, बेचा जाता और फिर से बाँटा जाता। इन महीनों में शहर नाविकों और सामान से भर जाता था। वहीं दूसरी ओर कुछ महीने ऐसे भी होते थे जब सब कुछ शांत रहता और लोगों को इंतज़ार करना पड़ता था। व्यापार ठप पड़ जाता और गलियाँ व बाज़ार सुनसान रहते। शहर की गतिविधि को समझने का एक अच्छा तरीका है उसकी आबादी को देखना। एक अन्य फ्रांसीसी यात्री जीन डे थेवेनोट (1633-1667) ने सूरत शहर के बारे में बताया कि कैसे सर्दियों के महीनों में यह शहर लोगों से भर जाता था:

“सूरत मध्यम आकार का शहर है और यहाँ के निवासियों की सही संख्या बताना मुश्किल है क्योंकि मौसम के साथ यह संख्या बदलती रहती है। साल भर यहाँ काफी लोग रहते हैं, लेकिन मानसून के समय, यानी नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी, मार्च और अप्रैल के महीनों में जब जहाज भारत से सुरक्षित आ-जा सकते हैं, शहर इतना भर जाता है कि ठहरने की जगह ढूँढ़ना मुश्किल हो जाता है और शहर के तीनों उपनगर भी पूरी तरह भर जाते हैं।” (थेवेनोट 1684: 43, लेखिका द्वारा अनुवाद)

यह विवरण दिखाता है कि कैसे मौसम और हवाओं के चक्र के साथ शहरी जीवन पूरी तरह बदल जाता था। नवंबर से अप्रैल तक, जब जहाज अरब सागर पार कर सकते थे, शहर बेहद भीड़भाड़ वाला हो जाता था और लोगों को रहने की जगह ढूंढ़ने में मुश्किल होती थी। जैसे आज के पर्यटन वाले शहर ‘लो सीजन’ में खाली और ‘हाई सीजन’ में पर्यटकों से भर जाते हैं, वैसे ही सूरत शहर का जीवन भी दो अलग-अलग गति के अनुसार काफी बदलता रहता था। यूरोपीय यात्रियों के अन्य विवरण बताते हैं कि कैसे विदेशी व्यापारी और यात्री सक्रिय मौसम का इंतज़ार करते थे, और साल के बाकी समय में अकेलापन और बोरियत उनके मनोबल को प्रभावित करती थी, जिससे लंबे इंतज़ार के महीनों में मृत्यु दर भी बढ़ जाया करती थी। दुर्भाग्य से, उस समय के स्थानीय विवरण उपलब्ध नहीं हैं जो बताएं कि सूरत के निवासी (सूरती लोग) इस शहरी समयचक्र को कैसे देखते थे। संभवतः उनकी भावनाएं मिली-जुली रही होंगी, जैसे आज के स्थानीय लोग पर्यटकों के आगमन का इंतज़ार भी करते हैं और डर भी महसूस करते हैं यानि पर्यटक उनकी अर्थव्यवस्था को सहारा तो देते हैं, लेकिन शहर को भीड़ से भर देते हैं।

चित्र 3. डच जहाज वेस्ट इंडीज (मध्य अमेरिका) में लंगर डाले हुए — उत्कीर्णन कलाकार: वेंसस्लास होलर, 1647।
The MET संग्रह (25.83.5), Harris Brisbane Dick Fund, 1925।

बंदरगाह शहरों की ये दो अलग-अलग गति (यानि दो अलग-अलग मौसमी गतिविधि चक्र) का असर शहर के नक्शे और समाज पर भी साफ दिखाई देता था, जहाँ स्थायी रूप से बसे शहर और मौसमी तौर पर इस्तेमाल होने वाले इलाकों में स्पष्ट अंतर होता था। सूरत और हिंद महासागर के दूसरे बंदरगाह शहरों के उदाहरण से पता चलता है कि अगर हम विविधता और गतिशीलता के साथ-साथ इन शहरों के समय चक्र (मौसमी बदलाव) को भी समझें, तो हमें ऐतिहासिक बंदरगाह शहरों की खास जिंदगी को समझने का एक नया नजरिया मिलता है। इस विषय पर ‘को-टेम्पोरैलिटी ‘ नामक कार्यशाला (वर्कशॉप) में शहरी समय से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर चर्चा हुई थी। वहीं, समाजशास्त्री हेनरी लेफेवर के ‘रिदम एनालिसिस’ (1992) का सिद्धांत बंदरगाह शहरों के इन मौसमी बदलावों और समय की धरा को समझने के लिए एक बहुत उपयोगी ढांचा प्रदान करता है।

हेनरी लेफेवर ने समय को समझने के दो तरीके बताए – एक प्राकृतिक और दूसरा आधुनिक। पहला तरीका मौसमों और पुराने किसान समाजों की तरह चक्रों में चलता है, जबकि दूसरा तरीका घड़ी और मशीनों की मदद से समय को सीधी रेखा में गिनता है। उनका मानना था कि आजकल हम ज्यादातर दूसरे तरीके से समय को देखते हैं, हालांकि कई बार दोनों तरीके साथ-साथ चलते हैं। बंदरगाह शहरों में यह बदलाव साफ दिखता है। पहले जहाज सिर्फ मानसून के मौसम में ही चलते थे, लेकिन भाप के इंजन और फिर पेट्रोल-डीजल के इंजन आने के बाद जहाज किसी भी मौसम में चलने लगे। इस वजह से 19वीं सदी के बाद से बंदरगाह शहरों का वह पुराना मौसमी चक्र (जब कुछ महीने बहुत व्यस्त और कुछ महीने बिल्कुल शांत रहते थे) धीरे-धीरे खत्म हो गया।

बंदरगाह शहरों का इतिहास हमें समय के बदलते स्वरूप के बारे में बहुत कुछ सिखाता है। आज से पहले के जमाने में इन शहरों की दिनचर्या को समझने से हमें इनकी खास बनावट और समय के साथ इनमें आए बदलावों को बेहतर तरीके से जानने में मदद मिलेगी। जैसे आज कई आधुनिक शहर त्योहारों और खास आयोजनों के जरिए पुरानी यादों को फिर से जीवित कर रहे हैं, वैसे ही बंदरगाह शहरों के मौसमी चक्र को समझकर हम आज के समुद्री शहरों को फिर से प्रकृति की लय से जोड़ सकते हैं। यह हमें सिखाता है कि कैसे हवाओं और मौसम का संगीत हमारे शहरों की जिंदगी को खूबसूरत बना सकता है।

— सारा केलर

लेखिका – सारा केलर एक इतिहासकार हैं, जो प्राचीन भारतीय वास्तुकला में विशेषज्ञ हैं। वह शहरी इतिहास, ज्ञान के आदान-प्रदान और भारत के समुद्री इतिहास पर लिखती हैं। इस समय वह जल वास्तुकला और उससे जुड़े ज्ञान पर काम कर रही हैं, क्योंकि भारत की जल संस्कृति अद्वितीय और प्रेरणादायक है। हाल ही में उन्होंने अहमदाबाद के शहरी इतिहास पर एक किताब प्रकाशित की है।  

अनुवादक – अहमद अली जर्मनी के एरफर्ट विश्वविद्यालय में रिलीजियस स्टडीज के छात्र हैं, जहाँ वे प्रोफेसर डॉ. सुज़ैन राओ के अधीन “धर्म और शहरीकरण” शोध परियोजना में कार्यरत हैं। उनके शोध क्षेत्र में शामिल हैं – बौद्धिक इतिहास, वैश्विक रूप से ज्ञान का हस्तांतरण, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में समकालीन धर्म और संस्कृति, धार्मिक रीति-रिवाज, और भौतिक संस्कृति।

गुजरात के समुद्री इतिहास पर मेरे शोध लेख

Keller, Sara. 2013. Port Towns of Gujarat, Les cités portuaires du Gujarat. Bilingual exhibition catalogue (English-French). French Embassy in India.

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———. 2015. ‘Bharuch Fort during the pre-Sultanate Period’. In Ports of the Ancient Indian Ocean, edited by M.F. Boussac, J.F. Salles and J.B. Yon. Primus, 217–234.

———. 2016. ‘Surat. The first steps of the French adventure in India.’ RFIEA (Réseau français des instituts d’études avancées) n.14, 8–9.

———. 2019. ‘Introduction’. In Knowledge and the Indian Ocean. Intangible Networks of Western India and Beyond, edited by Sara Keller, Palgrave Series in Indian Ocean World Studies, 1–15. Palgrave Macmillan.

———. 2020. ‘False Cannons on Bharuch Barbican: A Fortified Custom House in an Active Port Town of Gujarat (16th Century Onwards)’. In Ports and Fortifications in the Muslim World. Coastal Military Architecture from the Arab Conquest to the Ottoman Period (Fouilles de l’Institut Francais d’Archeologie Orientale), edited by Stéphane Pradines, 159–72.

Keller, Sara, and Michael Pearson, eds. 2015. Port Towns of Gujarat. Primus. New Delhi.

Keller, Sara, and Fernando Rosa. 2019. ‘Scholars in Gujarat’s Bazaars –Revisiting L’académie Ambulante („The Roving Academy“)’. In Knowledge and the Indian Ocean – Intangible Networks of Western India and Beyond, edited by Sara Keller, 87–112. Palgrave Series in Indian Ocean World Studies. Palgrave Macmillan.

Keller, Sara, ed. 2019. Knowledge and the Indian Ocean – Intangible Networks of Western India and Beyond, Palgrave Series in Indian Ocean World Studies, Palgrave Macmillan, XLI.

इन्हें भी देखें:

Keller, Sara. 2021. “Hasmukh Shah: Tribute to a visionary and a generous mentor” MIWA. Metrology of Indian Waters. 06.12.2021.

———. 2020. Escale Nantaise. A la recherche de l’esprit du lieu. E-Book.

———. 2017. “Ports of Gujarat. The first Gateway to India” Vibrant Gujarat Special 2017 Biz@India. pp. 46-48.

———. 2015. “Tailleurs de pierre, métier d’avenir ?” Indes, La fenêtre sur l’Inde pour le monde francophone. 07-08.2015.

———. 2015. “Piram Island. Explorations sur l’île aux pirates” Indes, La fenêtre sur l’Inde pour le monde francophone. 03-04.2015.

———. 2014. ‘Bharuch Heritage’. Bilingual brochure (English-Gujarati) on the material heritage of Bharuch. French Embassy in India.

———. 2014. “Bharuch, la Dubai de l’Antiquité” Indes, La fenêtre sur l’Inde pour le monde francophone. 05-06.2014. pp. 50-52.

———. 2014. “Agate, Voyage à l’aube des civilisations” Indes, La fenêtre sur l’Inde pour le monde francophone. 01-02.2014. pp. 58-60.

———. 2013. “Ports du Gujarat, Portes des Indes” Indes, La fenêtre sur l’Inde pour le monde francophone. 07-08.2013. pp. 58-62.

लेफ़ेब्वर, बंदरगाह शहरों और भारतीय समुद्री इतिहास पर और पढ़ने के लिए

Beaven, Brad; Bell, Karl; James, Robert, eds. 2016. Port Towns and Urban Cultures. International Histories of the Waterfront, c.1700–2000. London: Palgrave Macmillan.

Chakravarti, Ranabir. 2021. The Pull Towards the Coast and Other Essays: The Indian Ocean History and the Subcontinent Before 1500 CE. Delhi: Primus.

Lee, Robert. 2012. ‘The Social Life of Port Architecture: History, Politics, Commerce and Culture.’ Bd. 54, ICOMOS – Hefte des Deutschen Nationalkomitees. 33–52. https://doi.org/10.11588/ih.2012.0.20425

Lefebvre, Henri. 1992. Éléments de Rythmanalyse : Introduction à La Connaissance Des Rythmes. Syllepses. Paris.

Malekandathil, Pius. 2020. ‘Maritime Histories, Indian Ocean and Port-Towns: Changing Dynamics of Urban Spaces in Pre-Modern India.’ Atna Journal of Tourism Studies, Vol. 15, No. 2, 115–147. https://doi.org/10.12727/ajts.24.6

Mehta, Makrand. 2015. ‘Genesis and Growth of Khambhat as a Port Town, c.600 to c.1600 CE’. In Port Towns of Gujarat, Primus, 123–38. Delhi.

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Rau, Susanne Rau. 2023. ‘The multiple beginnings of a city: Calicut (Kozhikode).’ EPOCH. https://www.epoch-magazine.com/post/the-multiple-beginnings-of-a-city-calicut-kozhikode

Rawat, Yaduvir Singh. 2015. ‘Coastal Sites: Possible Port Towns Of Harappan Time in Gujarat’. In Port Towns of Gujarat, edited by Sara Keller and Michael Pearson, 187–215. New Delhi: Primus Books.

Subrahmanyam, Sanjay. 2018. ‘The Hidden Face of Surat’. Journal of the Economic and Social History of the Orient. Vol. 61, No. 1/2, Speaking the End Times: Prophecy and Messianism in Early-Modern Eurasia. 205–255.

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Tagliacozzo, Eric. 2022. In Asian Waters: Oceanic Worlds from Yemen to Yokohama. Princeton University Press.

Tavernier, Jean-Baptiste. 1681. Les Six Voyages de Jean-Baptiste Tavernier Ecuyer, Baron D’Aubonne, En Turquie, En Perse Et Aux Indes (Seconde Partie). Gervais Clouzier. Paris.

Thévenot, Jean de. 1684. Troisième partie des Voyages De Mr. De Thevenot contenant la relation de l’Indostan, des nouveaux Mogols, & des autres Peuples & Pays des Indes. Paris: Claude Barbin.

Thévenot, Jean de. 1689. Les Voyages De Mr. De Thevenot Aux Indes Orientales (3). Charles Angot. Vol. 3eme partie. Paris.

Varadarajan, Lotika. 2011. Gujarat and the Sea. Darshak Itihas Nidhi.

ऊपर दिखाई देने वाली तस्वीर

‘Kai Khusrau Crosses the Sea’, Folio from a Shahnama (Book of Kings) of Firdausi, painted by Abu’l Qasim Firdausi Iranian, ca. 1610. The MET (1982.476.3), Gift of Wendy Findlay, 1982.

Sara Keller
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Sara Keller (October 6, 2025). समुद्री जीवन के मौसम. Religion and Urbanity: Reciprocal Formations. Retrieved October 16, 2026 from https://doi.org/10.58079/14uys


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