कालीकट की सड़कों पर चलते हुए (I)
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This post is a Hindi translation by Ahmad Ali of the blog post published by Susanne Rau on February 5 2020: “Walking through the streets of Calicut (I)”, Religion and Urbanity Blog. https://urbrel.hypotheses.org/815 Other blog posts in Hindi can be found here and here
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जैसा कि इस ब्लॉग के पाठक पहले से जानते हैं, मैं अक्सर कालीकट आती रहती हूं। शहर का आधिकारिक नाम “कोष़िकोड” है (मलयालम में: കോഴിക്കോട്), लेकिन इस शब्द का यूरोप वालों के लिए उच्चारण करना कठिन है, इसलिए हम इसे कालीकट ही कहेंगे। कहा जाता है कि अरब व्यापारियों ने इसे यह नाम (क़ालिक़ूट) दिया था।
आज जब हम बड़े भारतीय शहरों के बारे में सोचते हैं, तो आमतौर पर हमारे मन में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई या कलकत्ता, या शायद बेंगलुरु आता है। ये सभी आज के समय में या कुछ वर्षों में महानगर होंगे। हम इन्हें ‘वैश्विक शहर’ भी कह सकते हैं क्योंकि ये वाणिज्यिक और वित्तीय केंद्र हैं जिनके नेटवर्क दुनिया भर में फैले हुए हैं। बेशक, जब हम आज के ज़माने की अवधारणाओं को अतीत में स्थानांतरित करते हैं तो हमेशा सावधानी बरतनी चाहिए। लेकिन मैं यह दिखाना चाहती हूं कि किस हद तक, मध्यकाल के अंत से ही, एक या दूसरा शहर, वैश्विक व्यापार संबंधों या एक धार्मिक केंद्र के रूप में खुद को वैश्विक मानता था जो दुनिया भर से लोगों को आकर्षित करता था – कभी-कभी ये दोनों बातें।
आज के दृष्टिकोण से, कालीकट जनसांख्यिकीय, धार्मिक या आर्थिक दृष्टिकोण से कोई विशेष शहर नहीं है। इसमें लगभग आधा मिलियन लोग रहते हैं, या यदि आप पूरे समूह को शामिल करते हैं तो दो मिलियन। इस शहर को भारतीय शहरों की रैंकिंग में लगभग 100वें स्थान पर रखा जाता है। पर मध्यकाल और पूर्व-आधुनिक काल में यह अलग था।
कालीकट उस समय एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्द बंदरगाह और व्यापार केंद्र था। इसका संबंध इसके प्रागैतिहासिक काल से भी है। प्रारंभिक मध्यकाल से ही अरब व्यापारी यहां बसे हुए थे। तांगीयर से आये इब्न बतूता ने 14वीं शताब्दी के मध्य में पहले ही निर्धारित किया था कि कालीकट में एक महत्वपूर्ण बंदरगाह थी, जहां दूर-दराज के क्षेत्रों से व्यापारी आते थे। वास्को डा गामा ने 1498 में यहां लैंडिंग की, जब उन्होंने भारत का समुद्री मार्ग खोजने में सफलता पाई। पुर्तगालियों ने 1513 में एक किलेबंद फैक्ट्री का निर्माण किया, लेकिन दुश्मन के हाथों में गिरने के डर से 1525 में इसे छोड़ दिया। 1616 में, अंग्रेजों ने उनका अनुसरण किया। 1766 में, हैदर अली ने शहर पर कब्जा कर लिया; 1782 में, अंग्रेजों ने इसे अपने कब्जे में ले लिया।
जितने अधिक यूरोपीय – विशेष रूप से पुर्तगाली, डच, फ्रेंच और ब्रिटिश – दक्षिण एशियाई बाजारों में प्रवेश करते गए, कालीकट में व्यापार और इस प्रकार शहर का महत्व कम होता गया (मैथ्यू 2006)। हालांकि कम से कम 16वीं शताब्दी के अंत तक, कालीकट पूरब के मल्लका को पश्चिम के वेनिस के साथ जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाहों और व्यापार केंद्रों में से एक था।
यूरोप में भी, यह शहर काफ़ी समय पहले से ही व्यापारी समुदायों और विद्वानों के बीच प्रसिद्द था। 1572 और 1618 के बीच प्रकाशित, जॉर्ज ब्रौन और फ्रांस होगेनबर्ग द्वारा लिखित पुस्तकों में कालीकट का दृश्य इसका प्रमाण है।
1572 में कालीकट का दृश्य। (कॉपीराइट विवरण के लिए यहाँ देखें)।
कार्टूच पर लिखा हुआ है: “Calechut Celeberrimum Indiae Emporium”, जिसका अर्थ है “कालीकट, प्रसिद्ध भारतीय व्यापार केंद्र”। भारतीय शहरों में से केवल कन्नूर, गोवा और दीव ही इस पुस्तक में एक नगर दृश्य के साथ उपस्थित रहे हैं।
इन आकलनों के आधार पर, मैं यह अधिक विस्तार से जांचना चाहूंगी कि इस शहर में शहरीकरण कैसे विकसित हुआ है, या समकालीन पर्यवेक्षकों ने शहरीकरण को कैसे देखा। या, अगर हम एक कदम पीछे लें, तो यह शहर अपने सबसे बड़े आर्थिक सफलता और दृश्यता के समय में कैसा दिखता था: घर, सड़कें, चौक और इमारतें। और लोग इसमें कैसे चलते थे, इन स्थानों का उपयोग कैसे करते थे और इसके बारे में क्या सोचते थे और क्या अपेक्षाएं रखते थे। “धर्म और शहरीकरण” शोध समूह में हम मुख्य रूप से यह जांच रहे हैं कि धर्म और शहरीकरण ने एक-दूसरे को कैसे आकार दिया: “शहरीकरण में धर्म ने क्या भूमिका निभाई है? शहरीकरण ने धर्म को कैसे बदला है, और वे लगातार एक-दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं?” हालांकि, क्योंकि शहरीकरण केवल धार्मिक प्रथाओं, कर्ताओं और संस्थानों से प्रभावित नहीं हुआ है, हमें पहले अधिक सामान्य प्रश्न पूछने होंगे (किन परिस्थितियों में शहरीकरण उभरता है और संभवतः गायब हो जाता है) ताकि इसके विशेष धार्मिक भाग को ज़्यादा सटीक रूप से परिभाषित किया जा सके।
इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए, मैं पहले उस समय के यात्री जिन मार्गों से गुज़रे हैं उन पर चलने की कोशिश करुँगी या उनके विवरणों का पुनर्निर्माण करने की कोशिश करुँगी। बेशक, यह केवल तभी संभव होगा जब उन्होंने लिखित रिपोर्ट छोड़ी हो। इस मौके पर माइकल डी सेर्तो द्वारा प्रभाषित दो प्रकार के विवरणों को समझना होगा: नक्शा और पार्कोर। “नक्शा” एक ऐसे प्रकार का विवरण है जिसमे एक शहर का वर्णन “ऊपर से” किया जा रहा है जैसे कि कोई व्यक्ति पहाड़ या टॉवर पर खड़ा होकर कर रहा हो। “पार्कोर” में हम यात्री द्वारा तय किये गाए मार्गों पर चल कर देखते हैं (देखें Rau 2011)। यात्री, चाहे वे उस समय का व्यापारी हों या तीर्थयात्री, आम तौर पर हम इन्हे ‘वैश्विक एक्टर्स’ कहेंगे क्योंकि ये लोग प्रैक्टिकल दृष्टिकोण से योगदान देते हैं – दूर-दराज़ के स्थानों में यात्रा करके और उनकी कथाओं से सम्बन्ध बना के या तुलना करके – “वैश्विकता” का निर्माण करते हैं या कम से कम इसका एक विचार स्थापित करते हैं।
एक श्रृंखला में, मैं एक समय में एक यात्री के मार्ग का पालन करुँगी, इस शहर में चलते हुए – बल्कि – कल्पना करुँगी कि ऊंचाई से उसके मार्गों पर चल रही हूँ ताकि 15वीं और 17वीं शताब्दी के बीच इस शहर की एक छवि को धीरे-धीरे बना सकूं। आज हम फ्रांस्वा पिरार्द (1578-1621) से शुरू करेंगे, जिन्हें आमतौर पर “दे लावल” कहा जाता है, क्योंकि वे उत्तर पश्चिम फ्रांस के लावल नामक शहर से आए थे।
फ्रांस्वा पिरार्द मई 1601 में सेंट मालो से स्थानीय जहाज मालिकों के एक छोटे से दो-जहाज स्क्वाड्रन के साथ भारत के लिए, या शायद मोलुक्का द्वीपसमूह के लिए, रवाना हुए। दो महीने बाद पिरार्द का जहाज मालदीव के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया। दूसरा जहाज सुमात्रा के लिए रवाना हुआ। कुछ अन्य नाविकों के साथ, पिरार्द ने मालदीव में पांच साल बिताए, अपनी इच्छा के विरुद्ध एक मेहमान के रूप में। पिरार्द ने लोगों का अवलोकन किया और उनकी भाषा (धिवेही) सीखी, जिससे उन्हें उन लोगों कि जीवन शैली में गहरी अंतर्दृष्टि मिली। 1607 में, बंगाली आक्रमण के दौरान उन्हें पकड़ लिया गया और चिटगाँव ले जाया गया। वहां से, यानी पूर्व में बहुत दूर, उन्होंने एक लंबी यात्रा की मलाबार तट, कालीकट, कोचीन, कन्नूर और गोवा तक, शायद अन्य शहरों तक भी (बूचोन 1989; लेलिव्रे 2014, पृष्ठ 22)।
1610 में, इस समूह ने आखिरकार अफ्रीका और ब्राजील होते हुए यूरोप और फ्रांस लौटने में सफलता प्राप्त की। वहाँ पहुँचने के बाद पिरार्ड ने अपनी यात्रा के रोमांच और अवलोकनों पर एक रिपोर्ट लिखी। यह रिपोर्ट कुछ साल बाद तीन खंडों में प्रकाशित हुई: 1611 में पहले “Discours” में और फिर 1615 में दो खंडों में अधिक विस्तारित संस्करण (संदर्भ सूची देखें)।
पिरार्ड ने न केवल शहर की संरचना और घरों के बारे में लिखा, बल्कि सड़कों, चौकों, पानी के तालाबों, और उन – असल में मौजूद ना होने वाली – शहर की दीवारों के बारे में भी बताया, जिनकी यूरोपवासी हमेशा तलाश करते थे, साथ ही व्यापारियों और व्यापार में आने वाले सामानों का भी वर्णन किया। यह विवरण उस समय के सबसे लंबे विवरणों में से एक है, और इतना गहरा है कि इसे पढ़ते समय आप इस शहर के “जीवन के तरीके” को लगभग महसूस कर सकते हैं:
“कालीकट का नगर पूरे राज्य का प्रतिनिधित्व करता है, जैसे इसमें पूरे राज्य की झलक मिलती हो। मैंने वहां बहुत समय बिताया, और मैं कह सकता हूं कि यह एक बहुत सुंदर और बड़ा शहर है, जो समुद्र तट पर स्थित है, एक छोर से दूसरे छोर तक यह एक लीग और आधे से भी ज्यादा लंबा है। इस दूरी के साथ शहर और समुद्र के बीच मछुआरों (मुक्कुवर) और अन्य गरीब लोगों के घर हैं, जिनके पास अपने पगोड (हिंदू मंदिर) और पूजा स्थल भी हैं। पूरा समुद्र तट छोटी मछली पकड़ने वाली नावों और अन्य जहाजों से ढका हुआ है। शहर का घेरा पाँच लीग से अधिक है, लेकिन जिसे कालीकट कहा जाता है, वह वास्तव में एक बड़ा इलाका है, जो सुंदर, बड़े और शानदार भवनों और विशाल बागों से भरा हुआ है। एक ही घर के लिए उसके बगीचों, फलों के बागों, मछली के तालाबों, और खेतों के लिए बहुत बड़े स्थान की आवश्यकता होती है। और चारों ओर इसी प्रकार की हवेलियाँ हैं, जिनमें नायर, मलाबारी, मुस्लिम और अन्य विदेशी लोग रहते हैं, जिन्हें यहाँ स्वागत मिलता है। यह अन्य मलाबारी नगरों की तरह नहीं है, जहां केवल मलाबारी लोग रहते हैं: यहाँ आप सभी प्रकार के मंदिर और पगोड देख सकते हैं, जो बड़े और अच्छी तरह निर्मित हैं, विभिन्न धर्मों के लिए, जिनका मैं बाद में वर्णन करूंगा।”
पिरार्ड ने जब स्थान, आकार, विला जैसे घरों और धार्मिक विविधता का वर्णन कर लिया, तो वह बुनियादी ढांचे की बात करते हैं: पानी के टैंक, दीवारें, बाज़ार और बंदरगाह।
“यहां कई सार्वजनिक पानी के टैंक हैं, जो बहुत बड़े हैं, अच्छी तरह से पक्के किये गए हैं, और पत्थरों से बनी रेलिंग से घिरे हुए हैं। इन्हें अच्छी तरह से साफ और संरक्षित रखा गया है। हर धर्म के लिए अलग टैंक हैं; एक ऐसा टैंक भी है जो चौथाई लीग के घेरे में फैला है। यह टैंक इस क्षेत्र की अत्यधिक गर्मी के कारण बेहद ज़रूरी हैं। इस शहर की दीवारें बहुत मजबूत नहीं हैं: यह केवल मिट्टी के बांधों और छोटी दीवारों से घिरा हुआ है। घर यूरोप की तरह क्रमबद्ध या सड़कों में नहीं बने हैं, बल्कि बेतरतीब ढंग से बिखरे हुए हैं। लेकिन शहर के उस हिस्से में, जो समुद्र के करीब और राजा के बड़े गोदाम ‘अल्फांदेक’ के पास है, लगभग आधी लीग के घेरे में एक इलाका है, जो सड़कों की तरह व्यवस्थित और बना हुआ है, जैसे यूरोप में होता है। इस हिस्से में केवल दुकानें हैं, सभी प्रकार के कारीगर और व्यापारी, जो जनहित के लिए आवश्यक हैं। यह पूरा इलाका एक बाड़े से घिरा हुआ है, हालांकि यह पूरे शहर के घेरे के भीतर है। इन घरों में केवल वही फर्नीचर और उपकरण रखे जाते हैं जो आवश्यक होते हैं।
उनके बाज़ार, जिन्हें वे ‘बाज़ार’ या छोटे नगर कहते हैं, दिन भर इतने भरे रहते हैं कि वहां से गुजरना मुश्किल होता है। ये लोग हर नस्ल के होते हैं, केप ऑफ़ गुड होप से लेकर जापान तक। रात होते ही, हर कोई अपनी दुकान और गोदाम को लोहे की मोटी पट्टियों और ताले से बंद कर देता है, और अपने परिवार के साथ अपने घर चला जाता है, जो मैंने पहले ही बताया, बगीचों और अहातों के साथ बना होता है। इस बाज़ार की इमारतें बहुत बड़ी और अच्छी तरह से पत्थर और लकड़ी से बनी होती हैं, जिनमें दुकानें, गोदाम और आंगन होते हैं, जो पूरी तरह से सुरक्षित रूप से बंद होते हैं। यह स्थान केवल उनके माल और वस्त्रों को रखने या उनके कार्यों के लिए होते हैं, और वे यहां केवल दिन में समय बिताते हैं। इन हातों में तीन बड़े स्थान हैं, जहां सप्ताह के हर दिन बाज़ार लगता है। इस बाज़ार को दरवाजों और दीवारों से घेरा गया है, और चौकीदार यह सुनिश्चित करते हैं कि रात में कोई भी इन गोदामों में न रहे; और फिर भी कुछ भी चोरी नहीं होता, उनकी न्याय व्यवस्था और पुलिस इतनी अच्छी है। इन हातों में रात में केवल अधिकारी और दरबान रहते हैं, जिनका कर्तव्य होता है पूरी रात पहरा देना। यहां कोई भी मंदिर नहीं है। कालीकट में जो जहाज आते हैं और लंगर डालते हैं, वे अधिक सुरक्षित नहीं होते, क्योंकि यहां कोई सही बंदरगाह नहीं है, केवल एक खुला समुद्री मार्ग है, जिससे जब समुद्र की तरफ से हवा आती है, तो वे खतरे में पड़ जाते हैं। भूमि नीची है, और समुद्र में थोड़ा सा केप या प्रायद्वीप बाहर की ओर निकला हुआ है।”
फिर पिरार्ड घरों के निर्माण के बारे में अधिक विस्तार से बताते हैं, जिसकी तुलना वह मालदीव के घरों से करते हैं।
“जहां तक इस देश के घरों के निर्माण शैली और रूप का सवाल है, यह ध्यान देने योग्य है कि आम लोग मिट्टी से घर बनाते हैं और अपने घरों की छत नारियल के पत्तों से ढकते हैं, लेकिन मालदीव के लोगों की तरह इतनी देखभाल और कुशलता से नहीं। वे मिट्टी को पानी के साथ मिलाते हैं और बड़े-बड़े चौकोर आकार में ढालते हैं, फिर उन्हें धूप में सुखाते हैं और दीवारों के लिए उपयोग करते हैं। लेकिन धनी लोग अच्छे पत्थरों से निर्माण करते हैं और छत पर टाइलें लगाते हैं। उनके सभी घर चौकोर होते हैं, जैसे चार स्तंभों वाले मंडप, जिनके बीच में एक आंगन होता है। उनकी बढ़ईगिरी और कारीगरी बेहद सुंदर होती है: यह विभिन्न आकर्षक डिज़ाइनों में की जाती है, जैसे हम अपनी बेहतरीन अलमारियाँ और मेज़ें बनाते हैं, और सब कुछ रंगा हुआ होता है। उनके घरों में मंजिलें होती हैं, लेकिन उतनी ऊँची नहीं जितनी हमारे पास होती हैं। कुछ लोगों के पास दो या तीन घर होते हैं, जिनमें बीच वाला घर छोटे आंगन और स्तंभों के साथ होता है, और बाकी इसके चारों ओर चौहद्दी होती हैं। वे अपने घरों और आंगनों को इस तरह से बनाते हैं ताकि उनके फर्श पर पानी या गंदगी की एक भी बूँद न गिरे, जो बहुत चमकदार लकड़ी की मेज जितने साफ होते हैं।
सभी मलाबारियों के घर इसी प्रकार के होते हैं। उनके घरों के प्रवेश द्वार पर बड़े बरामदे होते हैं, चाहे वे गरीब हों या अमीर। उनके घरों को दीवारों से घेरा जाता है, खासकर अमीरों के घरों को; बाकी के घरों के चरों ओर गड्ढे और लकड़ी के मजबूत कटघरे नुमा चारदीवारी होती है, जो इतनी ऊँची होती है कि एक घर से दूसरे घर जाने के लिए आपको पाँच या छह सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं, और दोनों ओर लकड़ी के दरवाजे होते हैं जो ताले से बंद होते हैं। आप वहां कोई घर नहीं देखेंगे जिसमें बगीचा या बाग न हो, चाहे छोटा हो या बड़ा। इन घरों के सामने के बरामदे या ‘एवियर्ड्स’ उन राहगीरों को ठहरने, भोजन और पानी देने के लिए होते हैं, और सोने के लिए भी स्थान प्रदान करते हैं। वे इन्हें अपने घर के अंदर नहीं ले जाते ताकि ये यात्री रात में कभी भी, जब उनकी नावें या उनके साथी यात्री जाने के लिए तैयार हों, तो आसानी से जा सकें।”
अंत में, यह बताया जाता है कि क्यों कालीकट पूरे भारत का सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक शहर है। पिरार्ड ने शायद इस बात पर जोर दिया कि शहर में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता व्यापार के लिए बहुत सहायक थी, खासकर अपने देश फ्रांस के अनुभवों की पृष्ठभूमि में।
“लेकिन अब कालीकट शहर की बात करें: यह पूरे भारत का सबसे व्यस्त और सबसे व्यापारिक शहर है। यहां दुनिया के हर कोने से व्यापारी आते हैं, चाहे वे किसी भी देश या धर्म के हों, क्योंकि उन्हें यहां आज़ादी और सुरक्षा दी जाती है। राजा सभी तरह के धर्मों के पालन की अनुमति देता है, लेकिन यह सख्त मना है कि कोई भी धर्म के बारे में बहस या झगड़ा करे। इस कारण, इस मुद्दे पर कभी कोई विवाद नहीं होता और हर कोई राजा की कृपा और अधिकार के तहत स्वतंत्रता के साथ जीता है। राजा का मानना है कि यह शासन की एक मुख्य नीति है, जिससे उसका राज्य बहुत धनी और व्यापारिक हो सके। अगर कभी धर्म के विषय पर कोई झगड़ा या असहमति उत्पन्न हो जाती है, तो जिसने इसे शुरू किया उसे देशद्रोह के अपराध में शारीरिक दंड दिया जाता है, और क्षमा या सज़ा माफी की कोई उम्मीद नहीं होती।
इसी कारण, यहां सभी लोग शांति और मेलजोल के साथ रहते हैं, भले ही यहां के निवासी और यात्री विभिन्न नस्लों और धर्मों से संबंधित हों। यहां के मूल निवासियों, जो हिंदू और मुसलमान हैं, के अलावा कई ईसाई भी हैं। पुराने समय में यहां पुर्तगालियों ने दो कस्बे और किले बनाए थे, जिसकी उन्हें राजा ने समुद्र के पास बनाने की अनुमति दिया। लेकिन इनके बीच कभी दोस्ती या साझेदारी नहीं रही। यहां तक कि ये कस्बे और किले स्थानीय राजाओं द्वारा कब्जा कर लिए गए और पुर्तगालियों को बाहर निकाल दिया गया। आज के समय में यहां उनका कोई कस्बा या किला नहीं है, जैसा मैंने पहले बताया था। हालांकि, अब उनके बीच शांति हैं, और पुर्तगाली अलग-अलग उपहारों के जरिए इस राजा की दोस्ती बनाए रखने की कोशिश करते हैं, क्योंकि वे उससे किसी भी अन्य राजा से अधिक डरते हैं।
व्यापार के लिए, कालीकट में गोवा के वायसराय का एक एजेंट होता है, जिसे एक क्लर्क द्वारा सहायता दी जाती है, और उनके साथ उनकी पत्नियां और परिवार भी होते हैं। यह एजेंट एक प्रकार का राजनयिक होता है, जिसे भारतीय व्यापारियों के लिए पासपोर्ट जारी करने का अधिकार भी होता है। भारत के सभी बंदरगाहों और पोर्ट्स में, जो पुर्तगालियों के साथ शांति में हैं, ऐसे एजेंट होते हैं, अन्यथा व्यापारियों को पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए पुर्तगाली शहरों में बहुत परेशानी होती।”
वहां दो जेसुइट पादरी भी रहते हैं, एक इतालवी और दूसरा पुर्तगाली, जिन्हें राजा द्वारा अच्छी तरह से स्वीकार किया गया है। राजा उन्हें प्रति वर्ष सौ ताजों की पेंशन देता है, जो स्पेन में पांच सौ से अधिक के बराबर होती है, इसके अलावा उन्हें पुर्तगाल के राजा से भी उनकी जीविका और देखभाल के लिए सहायता मिलती है। उन्होंने समुद्र के किनारे राजा द्वारा दिए गए भूमि पर एक सुंदर और बड़ा चर्च बनाया है, जिसमें एक चारदीवारी और कब्रिस्तान भी जुड़ा हुआ है। उन्हें लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की अनुमति है, बशर्ते वे इसमें कोई ज़बरदस्ती न करें। मेरे जाने के समय तक उनके प्रयासों का अच्छा परिणाम मिल रहा था, क्योंकि पहले से ही कई नए ईसाई बन चुके थे (यानी धर्मांतरण कर चुके लोग)। वे केवल अपने चर्च में सार्वजनिक रूप से उपदेश देते हैं, और कहीं नहीं। वे बहुत अच्छे मकान में रहते हैं और उनके पास सुंदर बगीचे भी हैं, और उनके चर्च के सामने एक बड़ी क्रूस है। सभी ईसाईयों के घर उसी इलाके में पास-पास बने हुए हैं, जो उन्होंने खुद बनाए हैं। हालांकि, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ईसाई नहीं हैं, और यहां तक कि एक ही घर में कभी-कभी अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं।
ईसाईयों की चर्चा करने के बाद, मैं अब अन्य धर्मों के बारे में बताऊंगा जो कालीकट में प्रचलित हैं। उनमें से यहूदी अपने अलग इलाके और आराधनालय (सिनगॉग) में रहते हैं, जहां केवल वही प्रवेश कर सकते हैं। मुसलमान, भले ही वे विभिन्न जातियों और देशों से हों, फिर भी उनके धर्म में कोई अंतर नहीं है (सिवाय फ़ारसियों के, यानी पारसियों के), और वे मुस्लिम मलबारों के मंदिर में जाते हैं। इसके अलावा एक और समुदाय के लोग हैं, जो यद्यपि उसी धर्म के हैं, फिर भी वे स्थानीय लोगों से कोई संबंध नहीं रखते और उनके मंदिरों में नहीं जाते, बल्कि उनका अपना पगोडा (हिंदू मंदिर) होता है, जिसका वे उपयोग करते हैं। इनमें गुजरात के बनिए और दीव के व्यापारी समुदाय के लोग होते हैं, जो अपने ब्राह्मणों को सबसे अधिक सम्मान देते हैं। फिर भी, मलाबार के ब्राह्मण स्वतंत्र रूप से उनके पगोडा में प्रवेश कर सकते हैं, क्योंकि उनके साथ समान अधिकार होते हैं। मुझे यह भी कहना चाहिए कि वे भारत की एकमात्र जाति हैं, जिन्हें पूरे देश में सबसे अधिक सम्मान प्राप्त है, क्योंकि सभी हिंदू भारतीयों में उनमें से कुछ मौजूद होते हैं।”
— सुज़ैन राओ
लेखिका – प्रोफेसर डॉ. सुज़ैन राओ एक इतिहासकार हैं जो स्थानिक और शहरी इतिहास में विशेषज्ञ हैं और 2009 से यूनिवर्सिटी ऑफ एरफर्ट में काम कर रही हैं। 2018 से, वह मैक्स वेबर रिसर्च सेंटर में “धर्म और शहरीकरण” शोध समूह की प्रवक्ता हैं। उनका हालिया कार्य “हिस्ट्री, स्पेस एंड प्लेस” पढ़ने के लिए उपलब्ध है।
अनुवादक – अहमद अली जर्मनी के एरफर्ट विश्वविद्यालय में रिलीजियस स्टडीज के छात्र हैं, जहाँ वे प्रोफेसर डॉ. सुज़ैन राओ के अधीन “धर्म और शहरीकरण” शोध परियोजना में कार्यरत हैं। उनके शोध क्षेत्र में शामिल हैं – बौद्धिक इतिहास, वैश्विक रूप से ज्ञान का हस्तांतरण, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में समकालीन धर्म और संस्कृति, धार्मिक रीति-रिवाज, और भौतिक संस्कृति।
Bibliography
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Voyage de François Pyrard de Laval contenant sa navigation aux Indes orientales, aux molusques et au Brésil. Les divers accidens, adventures et dangers qui lui sont arrivez en ce voyage… avec la description des païs, mœurs, loix, façons de vivre, police et gouvernement, du trafic et commerce qui s’y fait…, 2 t. en 1 vol, Paris 1615.
Modern scholarly edition:
Voyage de Pyrard de Laval aux Indes orientales, 1601-1611 contenant sa navigation aux Maldives, Moluques, Brésil ; les divers accidents, aventures & dangers qui lui sont arrivés en ce voyage […] ; avec un petit dictionnaire de la langue des Maldives ; un traité des animaux & plantes des Indes, plus un bref avertissement & avis pour ceux qui entreprennent le voyage des Indes orientales, préface de Geneviève Bouchon; établissement du texte & notes de Xavier de Castro. Suivi en annexe de La relation du voyage des Français à Sumatra / de François Martin de Vitré, 1601-1603, 2 vols., Paris 1998.
Quotations are taken from the English translation:
The voyage of François Pyrard of Laval to the East Indies, the Maldives, the Moluccas and Brazil, transl. Albert Gray, 2 vol. in 3, London 1887-1890.
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Bouchon, Geneviève: A French traveler in Portuguese India (1601-1610): François Pyrard de Laval, in: STVDIA 49 (1989), p. 301-314.
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OpenEdition suggests that you cite this post as follows:
Susanne Rau (June 24, 2025). कालीकट की सड़कों पर चलते हुए (I). Religion and Urbanity: Reciprocal Formations. Retrieved October 17, 2026 from https://doi.org/10.58079/146ru








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